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‘कलाकार’: संजय टंडन

तुम्हारे जीवन को आकार प्रदान करने में, तुम्हारे विचार जानदार भूमिका निभाते हैं..

हमने अपने पाठकों के लिए इस साप्ताहिक कॉलम के तहत जिंदगी को जीने का एक अलग अंदाज सिखाने वाली प्रेरक कहानियों की शृंखला शुरू की है। इसके तहत में हर कड़ी में चंडीगढ़ बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष संजय टंडन और उनकी धर्मपत्नी प्रिया टंडन की लिखी सत्य साईं बाबा के प्रवचनों पर आधारित पुस्तक ‘सनराइज फॉर ट्यूजडे’ की एक कहानी प्रस्तुत कर रहे हैं-

एक जवान- होनहार कलाकार, अपने स्केचिंग पैड और पेंसिल के साथ, एक पार्क में बैठा हुआ था। उसने एक हृष्ट-पुष्ट और सुंदर लड़के को अपने वीडियो गेम के साथ, घास पर खेलते हुए देखा। उसकी मां उसके पास ही चादर बिछाकर लेटी हुई थी। कलाकार को बच्चे का चेहरा बेहद भोला-भाला और आकर्षक लगा। उसने तुरंत उस बच्चे का चित्र बनाना शुरू किया, कुछ समय में उसने चित्र पूरा कर लिया और उस बच्चे के पास गया। उसने बच्चे को उसकी तस्वीर दिखाई और शरारत पूर्ण ढंग से पूछा, ‘क्या तुम इस बच्चे को जानते हो? बच्चे ने उस चित्र को आश्चर्य से देखा और मुस्कुराते हुए बोला, ‘क्या आप जादूगर हो।

कलाकार बोला, ‘नहीं, मैं एक कलाकार हूं, क्या तुम अपने चित्र को अपने पास रखना चाहोगे? बच्चा बेहद रोमांचित ढंग से बोला, ‘क्या मैं इसे रख सकता हूं? ओह! आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं इसे अपने पास हमेशा संभाल कर रखूंगा । यह तो बहुत अनमोल उपहार है। बच्चे की मां ने भी कलाकार का धन्यवाद किया।

वह कलाकार चित्र बनाने में माहिर हो गया। उसने विभिन्न संस्कृति एवं धर्म के लोगों के चित्र बनाए। उसने भिखारियों, राजा-महाराजाओं, पुलिस वालों, गृहणियों, मॉडल, गोल्फ के खिलाडिय़ों इत्यादि के चित्र बनाए। वह तिब्बती चेहरा, यूरोपियन चेहरा, यहां तक कि सुंदर ग्रीक देवियों की प्रतिकृति बनाने में भी सक्षम था। वह अपनी कला में निपुण एवं पारंगत कलाकार बन गया था। वह अब अपने काम के लिए अधिक से अधिक परिश्रमिक भी वसूलने लगा। अब साधारण लोग उससे अपना चित्र नहीं बनवा सकते थे क्योंकि वह उसका दाम नहीं चुका सकते थे ।

उसका एक दोस्त, जो कि पुलिस अफसर था, शहर के नजदीक की छावनी में प्रभारी था। एक दिन जब वह जेल के करीब से गुजर रहा था, तो वह अपने मित्र से मिलने आ पहुंचा। जब वह अपने मित्र के साथ बैठा हुआ भूनी मूंगफली के साथ गरम कॉफी की चुस्की ले रहा था, तो उसने कहा, ‘मैंने आज तक किसी अपराधी का चित्र नहीं बनाया है। क्या मैं तुम्हारे कैदियों को देख सकता हूं? संभवत: उनमें मुझे कोई दिलचस्प विषय मिल जाए जो कि चित्र बनाने के योग्य हो।

अफसर ने कहा, ‘अवश्य। वे दोनों साथ-साथ जेल की चारदीवारी के अंदर गए। वहां पर काफी संख्या में अपराधी काम कर रहे थे। उनमें से एक खोया हुआ सा पेड़ के नीचे बैठा हुआ था। कलाकार बोला, ‘यह अत्याधिक दुखी और विचारमग्न दिखाई पड़ रहा है, क्या मैं यहां बैठकर उसको देख सकता हूं? क्या मैं उसके चेहरे की प्रतिकृति बना सकता हूं? जेलर ने उसके कंधे पर हाथ धरा और बोला, ‘यदि तुम्हें यह दिलचस्प लगता है तो अवश्य बनाओ।

कलाकार ने अपने कोट के जेब से स्केचिंग पेड निकाला और पूरी एकाग्रता से अपने काम में लग गया। वह काम के दौरान बार-बार उस अपराधी की ओर नजरें दौड़ा रहा था, फिर अपनी स्केचिंग कर रहा था। अचानक जब कलाकार ने उसकी ओर देखा, तो कैदी वहां नहीं था। बल्कि वह उसके बिलकुल बगल में ही खड़ा है। और उसके कार्य को बारीकी से देख रहा है। कलाकार ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा और बोला, ‘ओह! मैं तुम्हारा ही चित्र बना रहा था, तुम्हे बुरा तो नहीं लग रहा ना?

‘महोदय, मेरी जानकारी के बगैर, आप दूसरी बार तो ऐसा नहीं कर सकते थे!, कलाकार ने आश्चर्य से पूछा, ‘आप क्या कहना चाहते हैं?तब अपराधी ने अपनी जेब से बड़ी सावधानी से एक फटा-पुराना कागज निकाला। उस कागज पर तीन जगह टेप लगी थी और उसे बड़ी सावधानी से तह किया गया था। उसमें एक बच्चे की स्केच की हुई तस्वीर थी। अपराधी ने पूछा, ‘क्या आप इस बच्चे को जानते हो? कुछ देर खामोश रहने के बाद कलाकार ने कहा, ‘यह चित्र तो अवश्य ही मेरे द्वारा बनाया गया है। लेकिन यह तुम्हारे पास कैसे है? तुम कौन हो? अपराधी दुखी मन से हल्का सा मुस्कुरायाऔर उस फटे-पुराने चित्र की ओर इशारा करते हुए बोला, ‘ये मैं ही हूं। यह तब का है जब मैं अबोध मासूम था … किंतु आज मैं वो मासूम बालक नहीं हूं।

आज मैं वह हूं जिसका चित्र आपने अभी बनाया है… एक आपराधी… मैं बुरी संगत में फंस गया था और एक जालसाज बन गया। मैं एक चेकबुक के साथ पकड़ा गया, जिसे मैंने अपने मालिक की दराज से चुराया था, उसके सभी पन्नों पर मैंने मालिक के झूठे हस्ताक्षर किए थे। अब जेल में उस अपराध की सजा काट रहा हूं। जब मैं दस वर्ष का था, मेरी मां का देहांत हो गया, मेरा पिता शराब पीने में व्यस्त रहता था। सही जीवन जीने का सलीका सिखाने के लिए मेरे पास कोई नहीं था। ‘काश मैं अपनी मासूमियत को वापस हासिल कर सकता।उसने आंसू के तूफान में कंपकंपाती हुई जुबान में कहा। कलाकार भाव विभोर हो गया। वह बोला, ‘मेरे मित्र, मैं हर प्रकार से तुम्हारी मदद करने का प्रयास करूंगा, तुम अपनी जेल की मियाद पूरी कर लो । तुम्हारे लिए मेरे हृदय में खास जगह है। अब मैं तुम्हारे पिता का किरदार निभाऊंगा। मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगा।

हममें से अधिकांश के साथ ऐसा ही होता है। सांसारिक प्रपंच और इसके दांव-पेच, हमसे हमारी मासूमियत छीन लेते हैं। ईश्वर ने हमें फरिश्ते की तरह बनाया है। किंतु यह कू्रर संसार हमें शैतान बना देता है। यदि हम अपने आपको सिर्फ अपने परम पिता से जोड़कर रखने में कामयाब हो जाते हैं, तब तो उम्मीद होती है कि हम अपने आपको शुद्ध बनाए रख सकें। तब हमें ईश्वर से, किसी प्रकार का डर भी नहीं लगता। ईश्वर से प्यार करने के लिए इतना पर्याप्त होता है। जब झील में पानी कि एक बूंद गिरती है, वह अपनी पहचान खो देती है, लेकिन वही जब कमल के पत्ते के ऊपर गिरती है, वह मोती के समान चमकती और झिलमिलाती है। बूंद वही है, फर्क संगति का है।

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