'जीज़स का साथ': संजय टंडन - Arth Parkash
Sunday, January 20, 2019
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‘जीज़स का साथ’: संजय टंडन

‘जीज़स का साथ’: संजय टंडन

‘अपने ऊपर विश्वास रखो, यदि तुम्हें लहरों पर भरोसा नहीं है, तो तुम समुद्र पर कैसे विश्वास कर सकोगे?

हमने अपने पाठकों के लिए इस साप्ताहिक कॉलम के तहत जिंदगी को जीने का एक अलग अंदाज सिखाने वाली प्रेरक कहानियों की शृंखला शुरू की है। इसके तहत में हर कड़ी में चंडीगढ़ बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष संजय टंडन और उनकी धर्मपत्नी प्रिया टंडन की लिखी सत्य साईं बाबा के प्रवचनों पर आधारित पुस्तक ‘सनराइज फॉर ट्यूजडे’ की एक कहानी प्रस्तुत कर रहे हैं-

समुद्र के किनारे खड़े होकर, जीज़स क्षितिज की ओर देख रहे थे। सूर्योदय का समय था और आसमान का केन्वस, सूर्य की लालिमा से रक्तिम आभा में रंगा हुआ था। लहरों की बेचैनी से उठते ठंडी हवा के झोंके, ईश्वर के पुत्र के कंधों पर, सुनहरे बालों के छल्लों से मानो खेल रहे हों। एक अनुयायी आया और उनसे पूछने लगा, ‘प्रभु, पानी के ऊपर चलना, बिना उस में गिरे, आपके लिए कैसे संभव है? जबकि हम यदि ऐसा करने का जोखिम उठाते हैं, हम डूब जाते हैं और संभव है पानी में बह भी जाएं। जीज़स कोमलतापूर्वक मंद-मंद मुसकुराते हुए बोले, ‘ऐसा इसलिए है क्योंकि मुझे अपने पर विश्वास है और आत्म विशवास ही ऐसा करने का साहस देता है। इसीलिए मैं पानी पर वैसे ही चल सकता हूं जैसे की नाव पानी की लहरों पर नाच सकती है।

शिष्य ने जवाब दिया, ‘प्रभु, जबसे मैंने आपको पाया है, मेरा विश्वास अटल हो गया है। तब जीज़स ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा, ‘ऐसा है तो आओ, हम दोनों एक साथ चलते हैं।वे दोनों ही शांत भाव से पानी के ऊपर चलने लगे। अचानक एक भयानक लहर उनके सामने उठी, जीज़स लहर के साथ-साथ ऊपर उठ गए एवं सहज रूप से उस पर सवार हो गए, लेकिन शिष्य डूबने लगा और मदद के लिए ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा। जीज़स उसकी ओर नीचे की तरफ देखते हुए बोले, ‘मेरे बच्चे, क्या हुआ, तुम क्यों फिसल गए? भयभीत हृदय और आंखों से आंसू बहाते हुए, वहकांपती हुई आवाज़ में बोला, ‘प्रभु, इतनी विशाल लहर को आते देख कर मैं भयभीत हो गया । मुझे लगा कि वह मुझे अपने साथ ही बहा कर ले जाएगी। मैं डर से भर गया और डूबने लगा, अब आप मेरी मदद करो, मुझे बचा लो प्रभु ! जीजस ने ठंडी आह भरी और कहा, ‘जब तुम्हारा हृदय डर से भरा हुआ है, तो उसमें विश्वास के लिए कोई जगह ही नहीं है। काश तुमने लहरों के मालिक के बारे में सोचा होता, परन्तु तुमने केवल लहरों के बारे में ही सोचा।

जैसे डर विश्वास को खत्म कर देता है, ठीक वैसे ही, सूर्योदय की किरणों की गर्मी के साथ, प्रात: काल की ओस गायब हो जाती है । आत्मविश्वास ही वह धरोवर है जिसकी तुम्हें आवश्यकता है। यदि तुम में आत्मविश्वास है, तुम किसी भी रास्ते पर चल सकते हो, भले ही वह कितना भी कठिन क्यों न हो ।

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