बच्चों के इन मोजों की कीमत है 20 हजार रुपये खासियत जानकर खरीदने में दिलचस्पी दिखाएंगे - Arth Parkash
Sunday, December 16, 2018
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बच्चों के इन मोजों की कीमत है 20 हजार रुपये खासियत जानकर खरीदने में दिलचस्पी दिखाएंगे

बच्चों के इन मोजों की कीमत है 20 हजार रुपये खासियत जानकर खरीदने में दिलचस्पी दिखाएंगे

लिंडसे इलियट मां बनीं तो अपनी बेटी हेजेल को थोड़ी देर के लिए भी अकेला छोडऩे में उनका जी घबराता था।29 साल की इलियट टीचर हैं। घर से दूर जाने पर उन्हें हर वक़्त हेजेल की सेहत की चिंता लगी रहती थी। इलियट की चिंता एक मोजे ने दूर की। 300 डॉलर का यह स्मार्ट मोजा नब्ज मापता है और उसके आधार पर ऑक्सीजन स्तर, दिल की धड़कन और तापमान का डेटा तैयार करता है। इसे अस्पतालों की प्रेरणा से बनाया गया है। यह एप्पल वॉच और फिटबिट जैसा गैजेट है।

इलियट कहती हैं, ‘मुझे हमेशा डर लगा रहता था कि उसकी सांस बंद हो जाएगी। मैं बेचैन रहती थी। लेकिन ऑक्सीजन स्तर देखने से मुझे तसल्ली मिलती है। इलियट अमरीका के फ्लोरिडा में विंटर पार्क में रहती हैं। अब वह अच्छे से सो पाती हैं और आया पर भरोसा करते डिनर के लिए बाहर भी जा पाती हैं। हेजेल ने अगर स्मार्ट मोजा पहन रखा है तो इलियट अपने स्मार्टफोन से उसकी सेहत पर नजर रख सकती हैं।
इलियट जैसे कई मां-बाप ने स्मार्ट बेबी टेक्नोलॉजी को अपनाया है। यह पीढ़ी फ़ीडबैक और डेटा को सबसे ज्यादा अहमियत देती है। वे अपनी फिटनेस, नींद, खान-पान और काम करने की आदतों को ट्रैक करने के लिए ऐप्स और पहनने योग्य गैजेट्स का इस्तेमाल करते हैं। कई लोगों के लिए बच्चे की सेहत पर नजर रखने के लिए इनका इस्तेमाल बस एक अगला कदम है। पिछले कुछ साल में कई कंपनियों ने पहनने योग्य और अन्य स्मार्ट उत्पादों से बच्चों को लैस करने के बाजार को पहचान लिया है। ऑस्ट्रेलिया की सोशल रिसर्च फ़र्म मैक्क्रिंडल के मुताबिक हर हफ्ते दुनिया भर में ‘जेनरेशन अल्फाÓ के 25 लाख नये सदस्य पैदा हो रहे हैं।

इस पीढ़ी की शुरुआत 2010 में पैदा हुए बच्चों से मानी जाती है। उस साल आईपैड और इंस्टाग्राम लॉन्च हुए थे। 2025 में इस पीढ़ी के औपचारिक तौर पर समाप्त होने तक इसमें 2 अरब सदस्य शामिल हो जाएंगे। इन उत्पादों की मदद से मां-बाप नर्सरी से लगातार जुड़े रहते हैं। उनको बोतल, डमी, कॉट, प्रैम, कपड़े वगैरह के फीडबैक लगातार मिलते रहते हैं। इनमें से कुछ उत्पाद मां-बाप के तनाव को कम करते हैं तो कुछ दूसरे उत्पाद परवरिश के उन हिस्सों को पूरी तरह स्वचालित बना देते हैं, जिनके लिए मां-बाप पहले अनुभूतियों पर निर्भर रहते थे। उदाहरण के लिए दूध के बोतल की पेंदी से जुड़ा ‘इंटेलीजेंट बेबी फीडिंग मॉनिटर’ ब्लूटूथ से स्मार्टफ़ोन को डेटा भेजता है। बच्चे को दूध पिलाने के लिए मां पहले अपने अनुभव पर निर्भर रहती थीं। अब दूध की मात्रा, समय, उसके तापमान और बोतल के कोण तक को ऐप्स से नियंत्रित किया जाता है।

बेबी टेक्नोलॉजी के मेडिकल, इमोशनल और मनोवैज्ञानिक असर के बारे में अभी विस्तार में अध्ययन नहीं हुए हैं। इसके असर या इसकी जरूरत को लेकर भी विशेषज्ञों के बीच आम राय नहीं बन पाई है। चाइल्ड डेवलपमेंट रिसर्च ग्रुप ‘ज़ीरो टू थ्रीÓ की सीनियर डायरेक्टर रेबेका पार्लेकियन को लगता है कि मशीनों को देखते रहने से मां-बाप बच्चे की खास जरूरतों को नहीं समझ पाते। बच्चे अपने मां-बाप को देखकर भावनाओं पर नियंत्रण करना सीखते हैं। उसे गोद में लेने की जगह मशीनीकृत कॉट पर रखने से मां-बाप यह समझ नहीं पाते कि बच्चा क्या चाहता है- उसे झूला झुलाना पसंद है, मां की लाड़ अच्छी लगती है या कुछ और।

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