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चीन-पाक को दो टूक

चीनी राष्ट्रपति के उस बयान के मायने समझे जाने चाहिएं, जिसमें उन्होंने अपने सैनिकों को युद्ध के लिए तैयार रहने को कहा है। भारत समेत दूसरे पड़ोसी देशों के साथ तनावपूर्ण स्थिति पैदा करके रख रहे चीन के लिए यह समय अपनी नाक को बचाए रखने का है। अमेरिका समेत दुनिया के दूसरे प्रमुख देश चीन से रूष्ट हैं और उसके बर्ताव पर लगातार चिंता जता रहे हैं। ऐसे में खुद को सर्वोपरि रखने की कोशिश में चीन जहां भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर रहा है, वहीं युद्ध जैसी धमकी देकर अपने नागरिकों का मनोबल बनाए रखने की कोशिश भी कर रहा है। एलएसी पर भारी तनाव के बीच चीन को भारत की ओर से जो जवाब मिल रहा है, वह ड्रैगन को यह समझाने के लिए काफी है कि अब उसकी हेकड़ी के दिन लद चुके हैं। केंद्र सरकार ने लद्दाख और एलएसी से बाकी देश के जुड़ाव को और मजबूत करने के लिए वर्तमान समय में अनेक कदम उठाए हैं, इन कदमों से चीन की बौखलाहट सामने आ रही है। चीनी विदेश मंत्रालय की ओर से लगातार ऐसे बयान आ रहे हैं जोकि क्षेत्रीय शांति और दूसरे देशों की संप्रभुता के खिलाफ हैं। सबसे बढक़र चीन भारत के उन देशों के साथ संपर्क पर आपत्ति जता रहा है, जिनका भारत से मित्रता का नाता है। वियतनाम को लेकर भारत ने जिस प्रकार का रूख अपनाया है, उससे चीन का चेहरा लाल हो गया है। हालांकि यह ताज्जुब की बात है कि चीन इस प्रकार का रवैया अपना कर क्या साबित करना चाहता है, क्या इसका अर्थ यह नहीं निकलता है कि चीन न केवल इस क्षेत्र में अपितु पूरे विश्व में अपनी बददिमागी और विस्तारवादी सोच के द्वारा दूसरे मुल्कों की स्वतंत्रता को छीन लेना चाहता है। हालांकि भारत जैसे देश के होते चीन के मंसूबे कभी पूरे नहीं हो पाएंगे।
भारत की ओर से एलएसी पर शांति बहाली के लिए जहां चीन से बातचीत का दौर जारी है, वहीं चीन की बयानबाजी पर उसका कड़ा ऐतराज भी अब चीन को समझ लेना चाहिए। भारत ने प्रखर स्वर में चीन को चेताया है कि केंद्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख देश के अभिन्न हिस्से रहे हैं, हैं और रहेंगे। चीन को उसके आंतरिक मामलों पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है। गौरतलब है कि चीन की ओर से हाल ही में कहा गया था कि वह केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश राज्य को मान्यता नहीं देता। दरअसल, यह मामला लंबे समय से विवादित है और चीन का अरुणाचल प्रदेश के संबंध में बेतुका बयान रह-रह कर सामने आता रहता है। भारत सदैव से इस बयान का तीखा विरोध करता आया है, लेकिन अब उसका स्पष्ट बयान चीन की समझ में आ जाना चाहिए। अपने चारों तरफ के इलाके पर निश्चित सीमाबंदी के अभाव में उसे विवादित करार देकर अपनी कुंठा का पोषण करने वाले चीनी राजनीतिकों को यह भांप लेना चाहिए कि उनकी विस्तारवादी भूख के दिन अब लद चुके हैं। बेशक, यह तनाव का विषय है जोकि शायद ही कभी समाधान का दिन देखे, लेकिन इतना तय है कि भारत उसकी कुटिल सोच को हमेशा खत्म करता रहेगा। एलएसी पर तनाव की वजह भी चीन ही है, जिसने कभी नहीं चाहा है कि वहां सीमा रेखा निर्धारित हो। अपने हित में वह सीमा को आगे या पीछे करता रहता है।
यह तय है कि भारत की पूर्व सरकारों ने चीन से जुड़ी सीमा के प्रति उदासीनता ही बरती है। बेशक कुछ प्रोजेक्ट यहां के निवासियों की मांग पर शुरू कराए गए लेकिन सामरिक जरूरतों के हिसाब से यहां विकास नहीं हो सका। मौजूदा केंद्र सरकार ने अगर इस जरूरत को समझते हुए यहां व्यापक स्तर पर पुल और सडक़ें बनाने का काम शुरू किया है तो यह उचित ही है। चीन और पाकिस्तान हमेशा इस पर्वतीय इलाके की भौगोलिक स्थिति का फायदा उठाते रहे हैं, लेकिन हालिया संघर्ष के बाद भारत की ओर से सामरिक दृष्टि से अहम चोटियों पर कब्जा और भीषण सर्दियों के दौरान भी वहां बने रहने का इंतजाम चीन की नींद हराम किए हुए है। उसके बेतुके बयान इसकी पृष्ठभूमि में ही देखे जाने चाहिए। गौर होकि पाकिस्तान की ओर से भी ऐसे ही बयान आ रहे हैं। पिछले दिनों पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के एक करीबी नेता के हवाले से दावा किया गया था कि भारत सरकार की ओर से पाकिस्तान को द्विपक्षीय वार्ता की पेशकश की गई थी, लेकिन पाकिस्तान ने यह शर्त रखी थी कि बातचीत कश्मीर के मुद्दे पर ही होगी। यह बयान बेहद बेतुका है, भारत सरकार की ओर से ऐसी किसी बातचीत का विवरण देश से साझा नहीं किया गया है, हालांकि मौजूदा परिस्थितियों में पाकिस्तान से किसी बातचीत की गुंजाइश ही नहीं रह गई है, क्योंकि भारत घाटी से अनुच्छेद 370 को ही खत्म कर चुका है। भारत के लिए कश्मीर अब कोई मुद्दा नहीं है, कश्मीर के संबंध में पाक का प्रत्येक बयान अब भारत के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप ही माना जाएगा। ऐसे में भारत सरकार की यह नसीहत पाकिस्तान और चीन दोनों को गांठ बांध लेनी चाहिए कि वे उसके मामलों से दूर ही रहें।

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