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भक्ती भागने का नहीं जागने का नाम है: निरंकारी बाबा

सन्तजन-महापुरुष जहां इस इन्सानी जन्म के कल्याण के लिए संसार को जाग्रति देते हैं, वहां इस संसार की यात्रा को तय करने की सही विधि भी समझाते हैं। जीवन जीने का ढंग भी सिखाते हैं। महापुरुष हमेशा पारिवारिक एवं सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति सजग रहे हैं और निरंतर ऐसी ही सुन्दर देन इन्होंने इस संसार को दी है। इन्होंने भक्ति का यथार्थ ढंग बताया है कि भक्ति कहीं भाग जाने का नाम नहीं है।

अक्सर हम सोचते हैं कि शायद भक्ति तभी हो सकती हे जब हम परिवार और समाज से नाता तोड़कर कहीं जंगलो-वीरानों में डेरे लगा लें। ऐसा करके ही हम प्रभु की बंदगी, प्रभु की उपासना कर पायेंगे; लेकिन गुरु-पीर-पैगम्बरों के जीवन यह प्रमाणित करते हं कि किस प्रकार समाज में रहकर परिवार का पालन-पोषण करते हुए, कर्तव्यों का पालन करते हुए वे भक्ति पथ पर चलते रहे। हम भगवान राम का जिक्र करते हैं, रविदास जी आदि का जिक्र करते हैं। ये सभी गृहस्थ्त मार्ग पर चलते हुए प्रभी की उपासना, बंदगी करते रहे। भगवान कृष्ण का अमर संदेश ‘कर्म क्षेत्र में रहकर धर्म की पालना ही है।

उन्होंने बताया कि हमें कर्म करते हुए निरन्तर इस यात्रा को तय करना है, कर्म क्षेत्र से भागना नहीं हैं। अगर भागना ही यथार्थ होता तो भगवान श्री कृष्ण को इतना जोर क्यों लगाना पड़ता अर्जुन को रोकने के लिए। अर्जुन तो भागना ही चाह रहा था। कितना समझाना पड़ा भगवान श्री कृष्ण को, उसे कर्मक्षेत्रा में उपस्थित रहने के लिए। इसी प्रकार कबीर जी जैसे भक्त भी यही कहते हैं-

घर में ही जोग, भोग घर ही में।
अपने घर में रहते हुए, दसो-नहों की किरत दोनों हाथों से कर्म करते हुए उन्होंने अपना ध्यान इस प्रभु के साथ जोड़े रखा तथा यही कहा- ‘हत्थ काल वल, दिल यार वल। भाव, हाथ कर्म की ओर लगे हैं और दिल इस प्रीतम के साथ, प्रभु के साथ जुड़ा है। यही विधि सभी सन्तों ने सिखाइ है कि-
नामा कहे त्रिलोचना मुख से राम सम्हालि।
हाथ-पांव से काम कर चित निरंजन नालि।

बाबा गुरबचन सिंह जी भी अक्सर कहा करते थे कि जहां पर नशे इत्यादि कुरीतियां हैं इसी प्रकार दहेज आदि का भी समाज पर बोझ पड़ा हुआ है, इससे भी समाज को निजात प्रदान करनी है। उन्होंने महापुरुषों को ऐसी प्रेरणा दी कि किस प्रकार कर्तव्यों का पालन करते हुए किसी पर बोझ नहीं बनना है, कोई लालसा मन में नहीं रखनी है और बहुत सादगी के साथ इन रस्मों को सरअंजाम देना है।

वे अक्सर कहा करते थे कि क्या जो सिपाही मैदाने-जंग से भाग खडा हो, उसे परमवीर चक्र मिलते हैं? नहीं, ये मेडल, परमवीर चक्र उन्हें ही मिलते हैं जो मैदाने-जंग में रहकर अपनी जिम्मेदारी को पूर्ण रुप से निभाते हैं। इसी प्रकार यहां पर यह ब्रह्म रुपी दात देने से पहले कुछ प्रण लिये जाते हैं और उन प्रणों में एक प्रण यह भी हे कि हमने गृहस्थ में रहकर प्रभु परमात्मा की बंदगी करनी है, हमने अपने कर्तव्यों से मुख नहीं मोडऩा है। इस प्रण की हमने पूरी तरह पालना करनी है।

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