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अयोध्या फैसला: मंदिर बने या मस्जिद, बस देश में एकता बनी रहे
अयोध्या फैसला: मंदिर बने या मस्जिद, बस देश में एकता बनी रहे

अयोध्या फैसला: मंदिर बने या मस्जिद, बस देश में एकता बनी रहे

पार्क के उस कोने में बैठे तीन बुजुर्गों के पास से गुजरते हुए एक बात कानों में पड़ी। किसी ने कहा था-मंदिर बने या मस्जिद, देश बना रहना चाहिए। यह बात दिमाग में गहरे बैठते चली गई थी। सुप्रीम कोर्ट जब सबसे बड़ा फैसला सुनाने को तैयार है तो देश की धड़कनें बढ़ गई हैं, इन धड़कनों की प्रतिध्वनि हर गली-नुक्कड़, बाजार, कार्यालय, घर-मोहल्ला, स्कूल-काॅलेज, पार्क और हर उस जगह सुनी जा सकती हैं, जोकि हालात के प्रति संजीदा है। श्रीराम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद अब आखिरी सांसें ले रहा है। सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले जिसे करीब 40 दिन की लगातार सुनवाई के बाद सहेज कर रख लिया गया था, के सामने आने का इंतजार अब हर किसी को है। यह फैसला देश के इतिहास की ऐसी तारीख होगा जिस पर भविष्य की नींव रखी जाएगी। चाहे वह हिंदू हो या मुस्लिम, या सिख और इसाई या फिर किसी और धर्म का अनुयायी टकटकी लगाकर यह इंतजार कर रहा है कि आखिर अयोध्या में अब विवादित जगह पर घंटियां गूंजेगी या फिर अजान में हाथ जुड़ेंगे।

दरअसल, यह फैसला किसी के भी हक में जाए लेकिन एक आशंका देश को डरा रही है। भावनाओं के चरम पर पहुंचने वाला देश अक्सर आत्म नियंत्रण खो देता है। इसके बाद जो होता है, वह इतिहास में अनेक बार दर्ज हुआ है। जब अयोध्या में मस्जिद का ढांचा गिरा था तो देश की भावनाएं किसी नदी के टूटे बांध की तरह बह निकली थी। यह मामला पूरी तरह व्यवस्था से जुड़ा था, बाद में पुलिस केस हुआ और अदालती प्रक्रिया भी शुरू हुई। अब जब देश की सर्वोच्च अदालत यह तय कर चुकी है कि उस जगह पर किसका अधिकार होगा, हिंदुओं का या फिर मुस्लिमों का तो देश के अंदर यह बेचैनी घर कर रही है कि कहीं एक पक्ष जिसके खिलाफ यह फैसला होगा, अपना आत्मनियंत्रण तो नहीं खो देगा? अब इस बेचैनी की दवा भी तलाशी जा रही है। आम जनता, देश के राजनेता, बौद्धिक वर्ग, मीडिया और वे सब जोकि चाहते हैं कि देश अब इतनी परिपक्वता दिखाए कि दुनिया हमारी धार्मिक एकता और भाईचारे को सलाम करे, यह जत्न करने में जुटे हैं कि फैसला कोई भी आए, देश सर्वोपरि रहे और सभी उस फैसले का सम्मान करें।

वास्तव में यह बेहद जरूरी है कि इस फैसले के जरिए देश की सर्वोच्च अदालत का रूतबा और उसकी न्यायिक दक्षता का न केवल सम्मान हो, अपितु उसे दिल और दिमाग से स्वीकार भी किया जाए। इस दिशा में भाजपा और संघ नेताओं ने मुस्लिम धर्मगुरुओं और बुद्धिजीवियों के साथ बैठक की है। इसमें जनता से अपील की गई है कि फैसला जो भी आए, देश का माहौल कतई बिगड़ने न पाए। इस दौरान न सड़कों पर जश्न हो और न ही भड़काउ बयानबाजी। सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या विवाद की सुनवाई के दौरान यह देखने को मिलता रहा है कि न्यूज चैनलों पर बैठकर तीखी बयानबाजी और पक्ष-विपक्ष में आपत्तिजनक बातें की जाती रही हैं। ऐसी बातों से माहौल ही खराब होता है, भावनाओं को भड़काने वाले लोगों जोकि किसी भी धर्म से जुड़ें हों, उनका बहिष्कार होना चाहिए। भारत में धर्म और राजनीति में चोली-दामन का साथ है, देश का बंटवारा तक धर्म के नाम पर हुआ है, ऐसे में धर्म की अनदेखी की सोचना दुर्लभ जान पड़ता है, लेकिन क्या हम अपनी सोच में बदलाव नहीं ला सकते? क्या हम उन राजनीतिकों और धर्म के ठेकेदारों को फैसले के बाद शांति और सौहार्द कायम रखते हुए जवाब नहीं दे सकते, जोकि चाहते ही हैं कि देश उद्धेलित हो ताकि उन्हें अपनी रोटियां सेकने का मौका मिले।दिवाली के पर्व से पहले कुछ राजनीतिकों ने ऐसे संकेत दिए थे कि जैसे उन्हें फैसले की काॅपी मिल चुकी है।

जाहिर है, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जितने बारीक तथ्य माननीय अदालत के सामने पेश किए गए, उसके बाद दोनों पक्षों के तर्क-वितर्क के आधार पर यह आकलन कर लिया गया है कि फैसला उसके हक में आने वाला है। हालांकि यह पूरी तरह से समझ लेने की बात है कि जिस भी धर्म के अनुयायियों के पक्ष में यह फैसला आएगा, वह सिर्फ उनके लिए नहीं होगा, अपितु पूरे देश के लिए होगा। यह कैसी विडम्बना है कि लंकापति रावण और उनके परिवार के पुतले बनाने के लिए मुस्लिम कारीगर ही आगे आते हैं, दिवाली के दीए, मिठाई, कपड़े, सजावट का सामान रहमान भी बनाता है और रामनिवास भी। लेकिन जब बात आस्था की आती है तो दोनों अपने-अपने धार्मिक प्रतिष्ठानों की ओर मुड़ जाते हैं। क्या यह नहीं हो सकता कि हम आस्था भी आधी-आधी बांट लें, कहें जो मेरा है वह आपका भी है। बेशक, यह कविता, कहानी और दर्शनशास्त्र की बातें समझी जाएं लेकिन जब दिमागों पर जमा अहंकार की धूल साफ होगी तो ऐसा संभव नजर आएगा।

अर्थप्रकाश समाचार पत्र समाज और देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए सभी पक्षों से और समाज के प्रत्येक वर्ग से इसकी प्रार्थना करता है कि हम देश की एकता और अखंडता को कायम रखेंगे और फैसले के बाद किसी ऐसी बात या घटना का हिस्सा नहीं बनेंगे जोकि आपसी सौहार्द और शांति को नुकसान पहुंचाए।

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