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29सी में 40 वेंडरों की अलाटमेंट, अभी तक 12-14 वेंडर ही पहुंचे

खुले आसमान में रोजी-रोटी कमाने की मजबूरी, मूलभूत सुविधाओं के नाम पर कुछ नहीं

मौली जागरां, रामदरबार में भी वेंडरों का हाहाकार

चंडीगढ़। शहर में स्ट्रीट वेंडरों को शिफ्ट करने की समस्या अभी खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। वैसे तो नगर निगम चंडीगढ़ की तरफ से सभी वेंडिंग जोन्स में वेंडरों की साइटें अलाट की जा चुकी हैं। किंतु अभी तक उन्होंने समुचित रूप से शिफ्टिंग नहीं की है।

मौली जागरां एवं रामदरबार में वेंडिंग का काम करने वालों ने पहले से ही रोना शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि उन्हें आईटी पार्क में शिफ्ट करने के लिए कहा गया है। किंतु इन जगहों पर शुरू किये काम को छोड़ अन्य स्थानों पर जाने से बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ेगा। यहां जमी जमाई बाजार और ग्राहक, उस पर उनकी मांग भी छोटी-छोटी चीजों की होती है। किंतु आईटी पार्क में शिफ्टिंग करके उन्हें वहां कुछ भीं नहीं मिलने वाला है। आईटीपार्क में एमएनसी कंपनियों में ज्यादातर लोग काम करते हैं। उनकी मांग भी काफी स्टैंडर्ड की होती है, जिसे पूरा कर पाना हमारे जैसे वेंडरों के बाद की बात नहीं है। यहां आकर तो अपनी रोजी-रोटी खोने वाली बात होगी। किंतु नगर निगम की तरफ से अभी इसके बारे कोई समुचित जवाब नहीं दिया गया है। क्योंकि इससे संबंधित मामला कोर्ट में लंबित है। उसके फैसले के बाद ही कुछ कह पाना ठीक रहेगा।

वेंडरों में फल विक्रेता विजय, किशनेश्वर प्रसाद, कुलछेवाला ताराचंद, छोले-भटूरे वाला संजय, जूस विक्रेता श्याम बिहारी सहित कुल 12-14 लोग शामिल हैं। मार्केट वैलफेयर कमेटी सेक्टर 29-सी के प्रधान हरीश छाबड़ा ने बताया कि सरकारी स्कीम के तहत इन्हें केवल साइट ही अलाट होती है। इसके अलावा कुछ भी नहीं।

मार्केट में शौचालय और पीने के पानी के टैप भी लगे हैं। किंतु अन्य लोगों द्वारा वहां कपड़ों की सफाई और नहाने का काम किया जाता है, जिससे इन चीजों का दुरुपयोग होता है। इस तरफ ध्यान देने की जरूरत है।

29 सी में वेंडरों ने रोया दुखड़ा

दूसरी तरफ सेक्टर 29-सी में वेंडर्स के लिए कुल 40 साइटों की अलाटमेंट की गई है। ङ्क्षकतु अब तक यहां कुछ गिने-चुने यानि 12-14 वेंडर ही काम कर रहे हैं। उनसे जब बात की गई तो उन्होंने कहा कि खुले आसमान के नीचे उन्हें छोड़ दिया गया है। ऊपर से कोई शैड नहीं, जिसके चलते बारिश और कड़ाके की सर्दी में उन्हें परेशान होना पड़ता है। अपनी दुकानदारी चलाने में भी उन्हें ठंड व बारिश की मार झेलनी पड़ती है।

जगह इतनी छोटी कि बैठ भी नहीं सकते

इसके अलावा जगहें इतनी छोटी हैं कि दुकानदारी तो दूर यदि वहां बैठना पड़े तो उनके बैठने की जगह भी कम पड़ती है। ऐसे में वह दुकानदारी कैसे कर सकते हैं।

शौचालयों में दुर्गंध

सबसे बड़ी समस्या उनकरे लिए समुचित पेयजल और शौचालय को लेकर है। किंतु अभी तक कोई बंदोबस्त नहीं है। मजबूरी में उन्हें बूथों के अंदर पुराने शौचालयों का प्रयोग करना पड़ता है। जो जीर्ण-क्षीर्ण हो चुके हैं। उनकी नालियां और सीवर भी जाम रहते हैं। इसके अलावा मीट-मछली की दुकानें भी उनके साथ हैं। जिससे वहां चारों तरफ दुर्गंध फैली रहती है।

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