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कृषि विधेयकों का विरोध राजनीतिक फायदा लेना तो नहीं    

तीन कृषि विधेयकों को लेकर देश में जिस प्रकार केंद्र सरकार, किसान संगठनों और विपक्ष के बीच गतिरोध कायम हो गया है, वह गुमराह करने वाली राजनीति का आईना है। भाजपा नीत केंद्र सरकार कह रही है कि इन विधेयकों से किसान की किस्मत चमकेगी, वह अपनी मर्जी का मालिक हो जाएगा। लेकिन विपक्ष विशेषकर कांग्रेस का आरोप है कि इन कानूनों के जरिए किसान को कंगाल किया जा रहा है।

पूंजीपति उसकी जमीन हथिया लेंगे, किसान अपनी जमीन गंवाएगा, आढ़ती अपना कारोबार और खेतीहर मजदूर भी कहीं का नहीं  रहेगा। हरियाणा और पंजाब जैसे राज्य जहां कृषि बहुतायत में होती है और कुल अनाज उत्पादन का जहां सर्वाधिक हिस्सा होता है,

विरोधी राजनीतिक दलों का आक्रोश चरम पर है। हरियाणा में भाजपा-जजपा गठबंधन की सरकार है, किसानों के मुद्दे को संवेदनशील माना जाता है, ऐसे में जजपा पर अब यह दबाव डाला जा रहा है कि वह किसान हितैषी होने का परिचय देते हुए भाजपा से समर्थन वापस ले। विरोधी चौधरी देवीलाल के किसानों के प्रति समर्पण की दुहाई देकर जजपा के जरिए सरकार को संकट में डालने की मानसिकता रख रहे हैं। वहीं पंजाब में कांग्रेस सरकार ने इन विधेयकों को पंजाब मारू, किसान मारू घोषित कर विरोध की अलख जगाई हुई है।

पंजाब में अकाली नेता हरसिमरत कौर बादल के केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफे ने इन विधेयकों का विरोध कर रही सरकारों, किसान संगठनों और राजनीतिक दलों को ताकत प्रदान की है। हालांकि अकाली दल के लिए यह बड़ा झटका है कि न केवल हरसिमरत कौर का इस्तीफा तुरंत स्वीकार कर लिया गया, अपितु अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार सशक्त अंदाज में विरोधियों को जवाब दिया है।

उनके इस आरोप को गंभीरता से लिए जाने की जरूरत है कि विपक्ष किसानों की कमाई को लूटने वालों के साथ है। दरअसल, यह समझे जाने की जरूरत है कि आखिर किसान ही विरोध कर रहे हैं या उनके पीछे कोई और भी है। पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों में आढ़ती बहुत बड़ी राजनीतिक और आर्थिक साख रखते हैं।

यह अपने आप में अनोखी बात है कि जिसने कभी खेत तक नहीं देखा है, वह किसान की फसल का मंडी में खड़ा होकर मूल्य तय करता है और उसे बिकवाने के नाम पर अपनी जेब भरता है। आढ़तियों के कमीशन पर केंद्र सरकारें पहले भी नजर डालती आई हैं, लेकिन उनकी लॉबी सरकार के हर प्रयास को ठप करती रही हैं।

आखिर विरोध के लिए विरोध की राजनीति भारत की पहचान क्यों बन गई है? स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट का आधार किसानों की तरक्की है, बदलती हुई अर्थव्यवस्था में अब खेती सामान्य बात नहीं रह गई है। आढ़ती अपने फायदे के लिए किसानों को उनकी उपज का पूरा फायदा क्यों नहीं लेने दे रहे? सरकार के लगातार आश्वासन के बावजूद एमएसपी को लेकर स्थिति संशयपूर्ण क्यों है। आखिर इन विधेयकों के जरिए किसान की जमीन पर संकट कैसे पैदा हो रहा है, विपक्ष इसका जवाब सही तरीके से क्यों नहीं देता। क्या यह भी सही नहीं है कि कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में कृषि सुधारों का जिक्र किया था, लेकिन अब भाजपा सरकार ने इसे लागू कर दिया तो वह इनका विरोध कर रही है, क्योंकि उसके हाथ से एक मुद्दा चला गया।

गौरतलब है कि केंद्र की ओर से पारित कराए गए कृषि विधेयकों को वर्ष 2017 में पंजाब की कांग्रेस सरकार ने विधानसभा में पारित कराया था। इसके बाद इन्हें वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने राष्ट्रीय स्तर पर अपने घोषणा पत्र का हिस्सा बनाया था। अब कांग्रेस दोहरा रवैया क्यों अपना रही है। आखिर इन विधेयकों को पारित करा कर तो केंद्र सरकार ने किसानों के हित में कदम उठाया है, ऐसे में पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने का आरोप लगाकर सरकार का विरोध करना क्या किसानों को गुमराह करना नहीं कहा जाएगा।

किसान संगठन विरोध के लिए एकजुट हो सकते हैं तब इन विधेयकों के कानून बनने के बाद संभावित नुकसान की स्थिति में क्या अदालत के दरवाजे उनके लिए नहीं खुले रहेंगे। इन विधेयकों के आलोचक तमाम वजह गिना रहे हैं, लेकिन इनकी खूबियों पर कोई बात नहीं हो रही। संभव है, इसी वजह से केंद्र सरकार ने विरोध पर कड़ा रूख अपनाया है, भाजपा ने अपनी सहयोगी अकाली दल के विरोध को भी अहमियत न देकर यही संदेश दिया है कि नए कृषि कानून खेती-किसानों का रूप बदलेंगे।

विरोधी राजनीतिक दल पूंजीपतियों का डर दिखाकर किसानों को तंगहाल में ही रखने के समर्थक हैं जो अनुचित है। देश अब प्रत्येक क्षेत्र में अगर नए नजरिए से देखने की कोशिश कर रहा है तो उसे स्वीकार किया जाना चाहिए। कृषि के विकास से पूरे देश की अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा। हालांकि केंद्र सरकार को चाहिए कि इन विधेयकों की मौजूदगी में किसानों एवं उपभोक्ताओं की आशंकाओं का समाधान हो।

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