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Acharya Chanakya Thoughts

बच्चे में न आएं गंदी आदतें इसके लिए माता-पिता क्या करें? बता रहे हैं आचार्य चाणक्य

Acharya Chanakya Thoughts : आचार्य चाणक्य के विचार और उनकी नीतियां भले ही कड़वी और कठोर हैं मगर हैं जीवन को सुधार देने वालीं और सफल देने वालीं| इसलिए आचार्य चाणक्य के विचारों से प्रेरित होकर उन्हें अपने जीवन में जरूर अपनाएं क्योंकि कठोरता ही जीवन की सच्चाई है। जीवन कोई फूलों की सेज नहीं है जिसपर आपका जीवन चलता जायेगा| अरे ये तो वो कस्ती है जो कभी डूबती है तो कभी हिचकोले लगाती है तो कभी बड़े आराम से अपने सफर को पार करती है| जीवन में कांटें भी हैं और फूल भी| इसलिए दोनों समय-समय पर आपको घेरते हैं| सुख-दुःख दोनों जीवन के साथी हैं| फिलहाल आचार्य चाणक्य के विचार तो बहुत हैं परन्तु आज हम उनके विचारों में से आपको एक विचार से अवगत कराने जा रहे हैं| ये विचार यूं है कि माता-पिता ऐसा क्या करें कि उनके बच्चे में गंदी आदतें प्रवेश न करें…|

इस मामले में आचार्य चाणक्य के विचार(Acharya Chanakya Thoughts) में घुली नीति कहती हैं- बच्चा जो देखकर-करके अर्जित करता है वैसा उसके गुणों का और आदतों का स्वरुप बन जाता है| हाँ ये सत्य है कि बच्चे के जन्मानुसार गुणों और आदतों को नष्ट नहीं किया जा सकता है मगर इनपर कण्ट्रोल किया जा सकता है| आचार्य चाणक्य कहते हैं लेकिन सीखने वाले गुणों और अर्जित करने वालीं आदतों को नष्ट करना संभव है| इन दोनों में क्रमों में अगर गुण और आदतों का स्वाभाव अच्छा है तो कोई हर्ज नहीं है यह अच्छी बात है परंतु अगर यह बुरा है तो कष्ट आपके बच्चे की राह तो देखता ही है साथ ही माता-पिता को भी कष्ट की अग्नि में झुकना पड़ता है|

समय पर ध्यान दें माता-पिता ….

चाणक्य कहते हैं कि माता-पिता को बच्चों का ठीक उसी तरह से ख्याल रखना चाहिए, जिस तरह से माली अपने बाग का रखता है क्योंकि बाग में माली अगर समय पर ध्यान न दे तो पौधों का हाल बुरा हो जायेगा| ठीक उसी तरह बच्चे भी हैं माता पिता का इनपर ध्यान न देना इनकी हालत बिगाड़ सकता है| चाणक्य का मानना है कि बच्चों में गंदी आदतें जल्दी प्रवेश करती हैं। समय पर ध्यान न देने वाले माता-पिता के हाथ पछतावा लगने के अलावा और कुछ नहीं लगता| इसलिए बच्चे पर समय पर ध्यान देना आवश्यक है| उसकी कार्यशैली पर आपकी समय-समय पर नजर होनी चाहिए| जिससे आप अपने बच्चे को सही गलत समझा पाएं| बच्चों को समय-समय पर टोंकना, डांटना और रोकते रहना चाहिए।कई बार माता-पिता बच्चों को डांटने में संकोच करने लगते हैं। लेकिन ऐसा नहीं करना चाहिए। जिस तरह से कुम्हार बर्तनों को थपकी देकर उन्हें आकार प्रदान करता है। ठीक उसी तरह से माता-पिता को समय-समय पर बच्चों को रोकते और टोकते रहना चाहिए।

दुलार सीमा में हो….

देखा जाता है कि कोई-कोई माता-पिता अपने बच्चों से कुछ कहते ही नहीं चाहें वो जो भी करते रहें| उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए| इसप्रकार करे दुलार का नतीजा उनके बच्चों और उनके दोनों के लिए घातक साबित हो सकता है| क्योंकि ऐसे बच्चे शरारत की हर सीमा पार करने लग जाते हैं| जिद्दी हो जाते हैं| इसलिए बच्चों के प्रति दुलार सीमा में हो| क्योंकि आप जो सीखाएंगे बच्चे के काम वही आएगा इससे वह खुद का और आपका नाम रोशन कर सकेगा| इसलिए बच्चों की परवरिश अनुशासित और आदर्श तरीके से होनी चाहिए। चाणक्य कहते हैं कि जिस तरह से शक्कर का ज्यादा इस्तेमाल करने से मधुमेह का खतरा बना रहता है। ठीक उसी तरह से ज्यादा प्यार से बच्चे अपने लक्ष्य से भटक जाते हैं। तो ये थी Chanakya Niti, अगली चाणक्य नीति से रूबरू होने के लिए बने रहिये अर्थ प्रकाश पर ..

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