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किसान बदलाव को स्वीकारें, सरकार भी करे आशंकाएं दूर

केंद्र सरकार के तीन कृषि अध्यादेशों को लेकर देशभर के किसान संगठनों में जो बेचैनी है, वह समझी जानी चाहिए। खेती को कॉर्पोरेट बिजनेस की तर्ज पर चलाने की मंशा रखने वाली केंद्र सरकार को पहले किसी गांव के उस किसान की मनोदशा को भी समझना चाहिए जोकि इन अध्यादेशों जोकि पारित हुए तो कानून बन जाएंगे के संबंध में बहुत कम जानता है या फिर उसे सही जानकारी उपलब्ध नहीं हो सकी है। हरियाणा में बीते दिनों कुरुक्षेत्र में जो हुआ वह किसानों को आंदोलित करने और राज्य की राजनीति में खलबली मचाने के लिए काफी था। किसानों पर लाठीचार्ज हुआ या नहीं यह बेशक जांच का विषय है, लेकिन सरकार किसानों की आवाज को उठने से नहीं रोक सकती। यही वजह है कि किसानों से बातचीत या उन्हें इन अध्यादेशों के संबंध में बहुत पहले से जानकारी न देने का प्रतिफल अब सरकार भुगत रही है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने किसानों के प्रति जहां नरम रूख रखते हुए उन पर लाठीचार्ज की निंदा की वहीं हालात सुधारने के लिए तीन सांसदों की एक कमेटी बना दी, जोकि जिलों में जाकर किसान संगठनों से उनके सुझाव ले रही है। अब विपक्ष का यह आरोप मायने रखता है कि इस कमेटी के पास कोई संवैधानिक अधिकार नहीं हैं, क्योंकि इन्हें सरकार ने नहीं अपितु सत्ताधारी पार्टी के अध्यक्ष ने नियुक्त किया है। कहा गया है कि इस कमेटी की ओर से लिए जा रहे सुझावों को प्रदेश अध्यक्ष के समक्ष रखा जाएगा, जिसके बाद केंद्रीय कृषि मंत्री को रिपोर्ट पेश की जाएगी और संसद के इसी सत्र में पेश होने जा रहे कृषि संबंधी बिलों में इन सुझावों को शामिल कराया जाएगा। यह सब इतनी जल्दी हो पाएगा, किसानों के दिलोदिमाग में यह सवाल भी है।  

वास्तव में इन अध्यादेशों को लेकर बनी स्थिति पर काफी कुछ कहने को है। खेत-खेती किसी किसान के लिए उसके परिजनों की भांति है। वह जैसे उनके संबंध में गहराई से सोचता है, उसी प्रकार खेती-किसानी भी उसके लिए अहमियत रखते हैं। ऐसे में केंद्र सरकार को इन अध्यादेशों को तैयार करने से पहले एसी कमरों में बैठकर नहीं अपितु गांव-गांव जाकर खेती से जुड़े लोगों से चर्चा करनी चाहिए थी। हालांकि अगर सरकार का पक्ष समझें तो आज का वक्त खेती में बड़े बदलाव का है। यह बदलाव खेत में जमीन तैयार, बीज बोने, फसल की कटाई और फिर मंडी में उसे बेचने तक होना जरूरी है। इन अध्यादेशों में आढ़तियों जोकि सदियों से किसानों के साथ मिलकर अपना कारोबार चला रहे हैं, के संबंध में भी निर्णय लिया गया है। हरियाणा सरकार ने आढ़तियों के जरिए किसानों की फसल खरीद और भुगतान को रोकने का प्रयास किया था, लेकिन उसमें उसे सफलता नहीं मिली। सरकार का तर्क था कि किसान को सीधे भुगतान मिलेगा तो यह उसके लिए फायदेमंद होगा। हालांकि आढ़तियों ने इसका विरोध किया। अब यह सवाल प्रमुखता से उठ रहा है कि क्या आढ़ती वास्तव में कमीशन के हकदार हैं। क्या ऐसी प्रणाली नहीं बन सकती कि किसान सीधे अपनी फसल बेचे और उसका पूरा प्रतिफल उसे मिले। हरियाणा के आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने मुखर होकर आढ़तियों को दिए जाने वाले कमीशन पर सवाल उठाकर इसी बहस को बड़ा रूप दे दिया है।  

इन अध्यादेशों को लेकर किसान और उनके संगठनों को सबसे बड़ा डर एमएसपी को लेकर है। एमएसपी के संबंध में यह आशंका सच भी साबित हो सकती है, क्योंकि जिस समय फसल मंडी में होगी तो खरीदार शायद ही किसान का हित समझे, वह अपनी जेब भरने की सोचेगा। ऐसे में किसान संगठनों की यह मांग उचित जान पड़ती है कि सरकार किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी की गारंटी दे। वैसे, सरकार को इसमें ऐतराज भी क्यों होना चाहिए कि वह एक न्यूनतम मूल्य निर्धारित करके चले। दरअसल, खेती-किसानी से संबंधित कानूनों का राजनीतिकरण होना ही नहीं चाहिए। खेती हमारे देश की राष्ट्रीय धरोहर है। वहीं किसानों को भी यह चाहिए कि बदले दौर में वे खेती के संबंध में नए प्रयोग करने को तैयार हों। खेती में उच्च स्तर के प्रयोग एवं उनके जरिए उत्पादकता को बढ़ाकर फायदा लेने की योजना अब सर्वोपरि होनी चाहिए। इस परिवर्तन के लिए किसानों को तैयार करने का काम सरकारें ही कर सकती हैं। भाजपा शासित राज्यों में इन अध्यादेशों को लेकर सरकार क्रियाशील है लेकिन गैरभाजपा शासित राज्य इनका विरोध कर रहे हैं। ये राज्य तो इनमें सुधार तक की मांग नहीं कर रहे हैं, अपितु सिरे से ही इन अध्यादेशों की जरूरत को निरस्त कर रहे हैं। यह उचित जान नहीं पड़ता। विकास के लिए नई राहें अपनानी ही पड़ती हैं। केंद्र सरकार से अपेक्षा है कि वह किसानों की उन आशंकाओं को खत्म करेगी जोकि उनके द्वारा इन अध्यादेशों के विरोध का आधार बन रही हैं।  

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