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निर्भया के दोषियों को फांसी कानून और न्याय की जीत

7 साल 3 महीने और 3 दिन। आखिरकार 20 मार्च की सुबह निर्भया के दोषियों के लिए आखिरी सुबह साबित हुई। सुबह नया पैगाम लेकर आती है, सुबह से अनेक उम्मीदें जुड़ी होती हैं, सुबह का सूरज अपने साथ ऐसी ऊर्जा लेकर आता है, जोकि हमारे तन-मन में नए संकल्प भरती हैं। हालांकि चार दोषियों का दुर्भाग्य रहा कि उनके लिए यह सुबह मौत बनकर आई। हालांकि बावजूद इसके इस सुबह का एक संदेश यह भी है कि हम किसी के प्रति बुरे होते हैं, तो उसकी सजा हमें जरूर मिलती है। फांसी के फंदे पर लटकने से पहले तक चारों दोषियों के मन में जो चल रहा था, वह उनके साथ ही खत्म हो गया लेकिन इससे पहले जेल की कोठरी में उन्होंने जो बर्ताव किया वह बताता है कि उन्हें अपने किए पर शर्मिंदगी थी, लेकिन इसे कभी उन्होंने स्वीकार नहीं किया। जब पूरा देश इस फांसी का इंतजार कर रहा था, तब चारों दोषी एक अति महत्वाकांक्षी व्यक्ति के साथ मिलकर न्यायपालिका का उपहास उड़ाते रहे। उनका यह उपहास फांसी से एक दिन पहले की रात तक चला, जब सुप्रीम कोर्ट ने अपने दरवाजे खोलकर रखे कि दोषियों का वकील कोई ऐसी दलील लेकर आए, जिससे फांसी को रोकना पड़े तो उसे रोक दिया जाए। यह भारतीय न्यायपालिका का महान चरित्र है कि उसने दोषियों को उनकी अंतिम सांस तक जीवन का मौका दिया।

चारों दोषियों अक्षय कुमार, पवन गुप्ता, विनय शर्मा और मुकेश कुमार को फांसी के बाद अब पूरे देश में खुशी की लहर है। भारत वह देश और समाज है, जहां दुश्मन की मौत पर भी दुख जताया जाता है, लेकिन यह मामला अपने आप में निराला था। एक युवती जिससे सामूहिक रेप हुआ और उसके बाद उसे ऐसे घाव दिए गए जिन्होंने उसकी जिंदगी उससे छीन ली, उसके दोषी अगर सात साल से ज्यादा वक्त तक जिंदा रह पाए तो क्या इस देश और उसकी न्यायपालिका को सादर नमन नहीं किया जाना चाहिए। दोषियों के वकील ने न्यायपालिका, कार्यपालिका और पत्रकारिता पर गंभीर आरोप जड़े हैं। उन्होंने इस फांसी को ही प्रायोजित करार दे दिया था, जबकि उनकी हर दलील पर कोर्ट ने सुनवाई की थी। भारत में ही ऐसा संभव हो सकता है, जब कोई इतना बेखौफ होकर देश के लोकतांत्रिक चरित्र और उसकी निष्पक्ष न्यायपालिका के चरित्र हनन की कोशिश कर सकता है।

निर्भया को न्याय दिलाने में उसके माता-पिता की भूमिका सदैव याद रखी जाएगी। दोषियों के वकील ने हर तिकड़म अपनाई जिसके संबंध में माननीय अदालत भी उन्हें आगाह करती रही, लेकिन पाप और अन्याय के साथ खड़े होकर वैसा ही आचरण रखने वाले संबंधित व्यक्ति ने आखिर समय में भी निर्भया और उसकी मां के प्रति जो टिप्पणी की, वह बेहद शर्मनाक और महिला विरोधी है। संबंधित व्यक्ति का कहना था कि निर्भया की मां को क्या मालूम था कि उसकी बेटी रात के 12.30 बजे कहां और किसके साथ घूम रही थी। यह उस युवती के चरित्र पर गंभीर आरोप था, वहीं देशभर में उन तमाम युवतियों और महिलाओं के चरित्र पर भी वार है, जोकि अपनी स्वतंत्रता से जीवन जीती हैं।

आखिर महिलाएं अगर देर रात सडक़ पर उतरें तो इसका मतलब यह हो जाना चाहिए कि बदमाश उनसे ऐसी शर्मनाक हरकत करें। क्या कानून सभी को बराबरी का दर्जा नहीं देता। इस फांसी के बाद अब यह कहा जा रहा है कि संभावित दोषी इससे सबक लें, वहीं यह भी उम्मीद व्यक्त की जा रही है कि महिलाओं के खिलाफ ऐसे अपराधों पर अंकुश लगेगा। यह अभी भविष्य के गर्भ में है, अपराधी की मानसिकता किसी को उसके अपराध की सजा से शायद नहीं बदलती। हालांकि यह तब जरूर बदलती है, जब उसे ऐसे संस्कार और सोच मिले। फांसी की रात एक दोषी विनय पुलिस कर्मियों के समक्ष गिड़गिड़ाते हुए बोलता रहा, मुझे माफ कर दो… मुझे नहीं मरना। जाहिर है, अगर ऐसी सोच उसने निर्भया के साथ अनाचार से पहले रखी होती तो वह उस घड़ी तक नहीं पहुंचता।

प्रत्येक दोषी अपने आखिर समय में सजा से बचने के लिए ऐसे ही गिड़गिड़ाता है। ऐसे में जरूरत इसकी है कि घर-परिवार और देश महिलाओं के प्रति जहां सुरक्षित माहौल कायम करने के लिए प्रयास करे, वहीं न्यायपालिका अपराधियों को कठोर दंड देने से न झिझके। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस सजा के बाद कहा कि निर्भया को न्याय मिल गया, वहीं उन्होंने इसका संदेश भी दिया कि महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इसका अत्यधिक महत्व है। जाहिर है, अपराधियों का यह समझ जाना चाहिए कि उन्हें उनके दोष की सजा मिलकर रहेगी, चाहे कितना वक्त लगे और वे कितनी ही तिकड़में अपना लें।

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