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यदि ज्ञान नहीं है तो कल्याण हो जायेगा पर ज्ञान पर श्रद्धान नहीं है तो कल्याण नहीं होगा: मुनि विभंजन सागर जी

श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन ,अटा मन्दिर ,ललितपुर, (उ. प्र.) में श्रमण श्री विभंजनसागर जी मुनिराज और श्रमण श्री विश्वाक्षसागर जी मुनिराज विराजमान है। आज प्रातः काल मुनिश्री ने अपने मंगल प्रवचन के माध्यम से बताया कि प्रवचनसार ग्रन्थ में ज्ञान पर जोर दिया गया है ,ज्ञान पर महत्व दिया गया है इर आचार्य भगवन कह रहे है की यदि ज्ञान नहीं है तो कल्याण हो जायेगा पर ज्ञान पर श्रद्धान नहीं है तो कल्याण नहीं होगा ।श्रुत पर श्रद्धान करने वाले का अल्प चारित्र से भी मोक्ष हो जाता है। इसलिए तू श्रुत को जनता ही नहीं है और श्रुत को मानता भी नहीं है तो तू बहुत चारित्र को पालने बाला होकर भी निर्वाण को प्राप्त नहीं कर सकेगा।
मुनिश्री ने बताया व्रत लेने के पहले उसका ज्ञान होना बहुत जरूरी है चाहे वह अणु व्रत हो या महाव्रत हो ।अणु व्रत श्रावक पालन करता है और महाव्रत श्रमण अर्थात मुनि पालन करते है ।दोनों को ही अपने व्रत के बारे में अच्छी तरह से ज्ञान प्राप्त करना चाहिए उसके बाद आचरण करना चाहिए। जब तक हमें अपने व्रत का ज्ञान ही नहीं होगा तब तक क्या हम उसका पालन कर पायेंगे ।उद्गम ,उत्पाद दोष इनका भी ज्ञान होना बहुत जरूरी है । व्रत में दोष लगने पर चेहरे पर मुस्कराहट नहीं खिन्नता आती है ।
मुनिश्री ने बताया श्रावक के बारह व्रतो में एक व्रत है अतिथि संविभाग इसका अर्थ है मुनि को भोजन देकर स्वयं आहार ग्रहण करना ,भोजन ग्रहण करना श्रावक के लिए कभी भी साधु को आहार नहीं बनाना चाहिए स्वयं अपने लिए बनाना चाहिए ।क्योंकि जो व्रती होगा वो अपने लिए शुद्ध भोजन बनायेगा। बस अतिथि संविभाग व्रत ये कहता है के साधु का पड़गाहन करने के लिए खड़े हो जाइये ।आहार की बेला में द्वार अपेक्षण कीजियेगा ।यदि साधु आ जाये तो ठीक है नहीं आये तो भी ठीक है, क्योकि जो स्वयं व्रती है वह कपङे लिए भोजन बनायेगा और उसको ग्रहण करेगा ।यदि व्रती होकर भी पड़गाहन नहीं करता है तो उसके बारह व्रतो का पालन नहीं होता है।वह व्रती नहीं है।
मुनिश्री ने बताया आपके नगर में कोई साधुओं का बड़ा संघ आ गया आअपकी जितनी शक्ति हो उतने दिन चौका लगाये।  बाद में बंद कर दो चाहे साधु पुरे आ जाये चाहे एक भी न आये। पुण्य मिलेगा पर मन में संक्लेशता नहीं लाना ।अभी तक तो श्रावक को यही नहीं पता की चौक कहते किसे है। श्रावक समझता है कि हमने घर में शुद्ध भोजन बना लिया, मर्यादित सामग्री का भोजन बना लिया और साधु को पड़गाने खड़े हो गये समझ लो चौक लग गया। नहीँ ,शास्त्र की बात करे तो चौक उसे कहते है जहाँ पर चार प्रकार की शुद्धि हो – द्रव्य शुद्धि, क्षेत्र शुद्धि, काल शुद्धि और भाव शुद्धि ये चारों का होना बहुत जरूरी है। जिस स्थान पर आपने चौक लगाया वो क्षेत्र शुद्ध होना चाहिए वहाँ पर जूता चप्पल आदि का आवागमन नहीं होना चाहिए ।जो द्रव्य आप साधु को देने को तैयार कर रहे है वो मर्यादित होना चाहिए, शुद्ध होना चाहिए । जिस काल में आप साधु को आहार करा रहे है वो काल शुद्ध होना चाहिए ,सामायिक ,स्वाध्याय का समय न हो और जो आप भोजन आहार दे रहे है वो बड़े भाव पूर्वक देना चाहिए। ये चारों प्रकार की शुद्धि जहाँ होती है वह चौक कहलाता है ।
मुनिश्री ने बताया कि चौका लगा कर व्यक्ति अपने आप को सोलह का कहता है कि मैं सोलह का हूँ ,मात्र शुद्ध बस्त्र पहनने से, धुले हुए वस्त्र पहनने से आप सोलह के नहीं बन जाते ।आगम का उल्लेख है सोलह का मतलब है जहाँ पर सोलह शुद्धिया हो। उन सोलह शुद्धियो में नवधा भक्ति और दाता के 7 गुण समाहित है ।पड़गाहन ,उच्चासन, पाद प्रक्षालन, पूजन, नमस्कार, मन शुद्धि, वचन शुद्धि, काय शुद्धि और आहार जल शुद्धि ये नवधा भक्ति होती है ,और श्रद्धा ,भक्ति ,तुष्टि, पुष्टि, विज्ञान,अल्वधता आदि दाता के 7 गुण होते है।  इन 16 से जो श्रावक सहित है वही श्रावक सोलह का कहलाता है। और वह श्रावक सोलह में रहकर चौके में दिगम्बर मुनिराज को बड़े भक्ति भावना से आहार दान करता है और अपने व्रतो का पालन करता है।
मुनिश्री ने बताया मुनियों के षड आवश्यक और श्रावक के षड आवश्यक ये यथार्थ में परिणामो की विशुद्धि के निमित्त है ।आप दे रहे हो द्रव्य और भीतर परिणति क्या चल रही है? निर्लोभ भाव ,निर्वेग भाव, संवेग भाव ,आत्मलाध भाव, आत्म प्रशाद भाव सम्यक विशुद्धि को प्राप्त हो रहा है। चारित्र में आपके कदम बढ़ रहे है और वहाँ आपको प्रिया दिखाई दे रही है। बाहर भले ही क्रिया हो रही हो ,अंतरंग में विशुद्धि बढ़ती है और काम अच्छे होते है। जब श्रावक चौका लगाता है तो उसके अन्दर आत्मानुभूति की, आनन्द की लहरे फूटने लगती है। आप हमारे घर में मुनिराज आयेंगे ,छोटा -छोटा बच्चा भी प्रसन्न, खुश हो जाता है कि हमारे यहाँ मुनिराज आयेंगे। महिलाएं प्रातः काल से ही शुद्धि का भोजन बनाना प्रारम्भ कर देती है और समय पर कुये से पानी भर कर लेती है ,भोजन तैयार करने के पश्चात पड़गाहन करने के लिए खड़े हो जाते है फिर देखना उसका आनन्द कितना आनंद आता है। हाँ दूसरे के चौके में वो आनन्द नहीं आता दूसरे के चौके में ऐसा होता है जैसे धाय माँ ने या नर्स ने प्रशुति कराई हो। जैसे की नर्स भी प्रशुति कराति है और धाय माँ भी प्रशुति कराती है पर नर्स को कोई पीड़ा नहीं होती ।दूसरे के चौके में तुम काम भी कराकर आ जाओ पूरा काम करा देना परंतु चौका खाली जाये तो भी उसे कोई तनाव नहीं है और आ भी जाये तो विशेष ख़ुशी नहीं है। वो तो नर्स की प्रशुति है ,जिसने स्वयं के द्रव्य का उपयोग किया है वो है जन्म देने वाली बेटे की माँ ।इसलिये श्रावक को स्व द्रव्य का, स्व स्थान पर, स्व हस्थ से दिगम्बर मुनिराजों को दान करके अपने व्रतो का ,अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

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