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विचार ही मृत को जीवित और जीवित को मृत बनाते है: मनीषी संत मुनिश्री विनय कुमार जी –
चंडीगढ़ जीवन में आगे बढ़ने के लिए सही और गलत का निर्णय लेता है हमारा विवेक। उसी के माध्यम से लक्ष्य को पाया जा सकता है। सिर्फ मनोरंजन प्रदान करने वाले कार्यो में हमारा मन खूब रमता है। यह जानते हुए भी कि उस कार्य से हमारे जीवन लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो सकती, फिर भी यदि हम वह कार्य लगातार करते जाते हैं, तो यह हमारा अविवेक है। वहीं यदि हम किसी विशेष कार्य को करने का निर्णय लेने से पहले यदि उसके परिणाम और दुष्परिणाम पर सोच-विचार करते हैं, तो ऐसा हम सिर्फ अपने विवेक की मदद से कर पाते हैं। भौतिक सुख-साधन अनित्य हैं और एकमात्र ईश्वर ही सत्य है। रुपये-पैसों से हमें क्या मिलता है? दाल-रोटी, कपड़े और रहने के लिए जगह-बस इतना ही और कुछ नहीं। निश्चित तौर पर रुपये से ईश्वर नहीं मिलते हैं। इसलिए रुपये कमाना कभी हमारे जीवन का उद्देश्य नहीं हो सकता है। यदि हम इस विचार पर अपनी सहमति जताते हैं और उसी के अनुरूप कार्य करते हैं, तो इसे हम विवेक-विचार कहते हैं। ये शब्द मनीषी संत मुनिश्री विनय कुमार जी आलोक ने सैक्टर 24सी में सभा को संबोधित करते हुए कहे। मनीषी श्रीसंत ने आगे कहा यदि हम किसी भौतिक साधन या व्यक्ति के प्रति आसक्त हैं, तो हम यह विचार कर देखें कि वास्तव में वह क्या है? क्या कालक्रमानुसार, इनका विनाश नहीं होगा या क्या वे नश्वर नहीं हैं? यदि जवाब हां में आता है, तो फिर अविनाशी ईश्वर को छोड़कर उन सभी चीजों में हमारा मन क्यों रमता है? हम उन चीजों के प्रति आसक्त नहीं, बल्कि अनासक्त हों। विवेक और वैराग्य दोनों के अर्थ अलग-अलग हैं। विवेक अर्थात सत-असत् का विचार और वैराग्य अर्थात संसार की वस्तुओं के प्रति विरक्ति या उदासीनता। यह एकाएक प्राप्त नहीं होता है। इसके लिए हमें रोज अ यास करना पड़ता है। भौतिक संसाधनों का त्याग पहले मन में करना चाहिए। अ यास के द्वारा मन में असाधारण शक्ति पैदा की जा सकती है। तब इंद्रिय संयम करने में, काम-क्रोध को वश में लाने में कष्ट नहीं उठाना पड़ता है। जैसे कछुआ एक बार हाथ-पैर समेट लेने पर फिर उन्हें बाहर नहीं निकालता। कुल्हाड़ी से टुकड़े-टुकड़े कर डालने पर भी नहीं। ठीक वैसा ही हमारा मन भी हो जाता है। मनीषी श्रीसंत ने अंत मे फरमाया स्वयं को सही समझने के अहंकार से बचें जब तक प्रकृति का ज्ञान नहीं होता, तब तक हम भौतिक संसाधनों के मिथ्या सुख में डूबे रहते हैं। प्रकृति को भूलकर मैं-मेरा करते हुए सांसारिक बंधनों में हम डूबते चले जाते हैं। माया के कारण हम इतने अंधे हो जाते हैं कि भागने का रास्ता होने पर भी हम जाल से भाग नहीं पाते हैं। इस बात को समझने के लिए हम मछलियों व रेशम के कीड़े के जीवन को देख सकते हैं। जाल में से निकलने की राह खुली है, फिर भी मछली भाग नहीं सकती। रेशम का कीड़ा अपनी ही लार से कोश बनाकर उसमें फंसकर अपनी जान गंवा देता है। अक्सर मनुष्य इस अहंकार में जीता रहता है कि वह जो कुछ कर रहा है, वह सही है। कोई भी वस्तु को तराजू पर तौलते समय जब तक कांटा ठीक न हो, तब तक ठहरकर देखना पड़ता है। मैं समय-समय पर स्वयं को गालियां देकर देखता था कि मुझमें अहंकार उठता है या नहीं? मैं हमेशा विचार करता था कि हमारा हाड़-मांस का शरीर कैसा है? जिस शरीर को एक दिन मिट्टी में मिल जाना है, उस पर अहंकार कैसा? मान लिया जाए कि हांडी में चावल पक रहा है।

विचार ही मृत को जीवित और जीवित को मृत बनाते है: मनीषी संत मुनिश्री विनय कुमार जी –

 

चंडीगढ़ जीवन में आगे बढ़ने के लिए सही और गलत का निर्णय लेता है हमारा विवेक। उसी के माध्यम से लक्ष्य को पाया जा सकता है। सिर्फ मनोरंजन प्रदान करने वाले कार्यो में हमारा मन खूब रमता है। यह जानते हुए भी कि उस कार्य से हमारे जीवन लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो सकती, फिर भी यदि हम वह कार्य लगातार करते जाते हैं, तो यह हमारा अविवेक है। वहीं यदि हम किसी विशेष कार्य को करने का निर्णय लेने से पहले यदि उसके परिणाम और दुष्परिणाम पर सोच-विचार करते हैं, तो ऐसा हम सिर्फ अपने विवेक की मदद से कर पाते हैं। भौतिक सुख-साधन अनित्य हैं और एकमात्र ईश्वर ही सत्य है। रुपये-पैसों से हमें क्या मिलता है? दाल-रोटी, कपड़े और रहने के लिए जगह-बस इतना ही और कुछ नहीं। निश्चित तौर पर रुपये से ईश्वर नहीं मिलते हैं। इसलिए रुपये कमाना कभी हमारे जीवन का उद्देश्य नहीं हो सकता है। यदि हम इस विचार पर अपनी सहमति जताते हैं और उसी के अनुरूप कार्य करते हैं, तो इसे हम विवेक-विचार कहते हैं। ये शब्द मनीषी संत मुनिश्री विनय कुमार जी आलोक ने सैक्टर 24सी में सभा को संबोधित करते हुए कहे। मनीषी श्रीसंत ने आगे कहा यदि हम किसी भौतिक साधन या व्यक्ति के प्रति आसक्त हैं, तो हम यह विचार कर देखें कि वास्तव में वह क्या है? क्या कालक्रमानुसार, इनका विनाश नहीं होगा या क्या वे नश्वर नहीं हैं? यदि जवाब हां में आता है, तो फिर अविनाशी ईश्वर को छोड़कर उन सभी चीजों में हमारा मन क्यों रमता है? हम उन चीजों के प्रति आसक्त नहीं, बल्कि अनासक्त हों। विवेक और वैराग्य दोनों के अर्थ अलग-अलग हैं। विवेक अर्थात सत-असत् का विचार और वैराग्य अर्थात संसार की वस्तुओं के प्रति विरक्ति या उदासीनता। यह एकाएक प्राप्त नहीं होता है। इसके लिए हमें रोज अ यास करना पड़ता है। भौतिक संसाधनों का त्याग पहले मन में करना चाहिए। अ यास के द्वारा मन में असाधारण शक्ति पैदा की जा सकती है। तब इंद्रिय संयम करने में, काम-क्रोध को वश में लाने में कष्ट नहीं उठाना पड़ता है। जैसे कछुआ एक बार हाथ-पैर समेट लेने पर फिर उन्हें बाहर नहीं निकालता। कुल्हाड़ी से टुकड़े-टुकड़े कर डालने पर भी नहीं। ठीक वैसा ही हमारा मन भी हो जाता है। मनीषी श्रीसंत ने अंत मे फरमाया स्वयं को सही समझने के अहंकार से बचें जब तक प्रकृति का ज्ञान नहीं होता, तब तक हम भौतिक संसाधनों के मिथ्या सुख में डूबे रहते हैं। प्रकृति को भूलकर मैं-मेरा करते हुए सांसारिक बंधनों में हम डूबते चले जाते हैं। माया के कारण हम इतने अंधे हो जाते हैं कि भागने का रास्ता होने पर भी हम जाल से भाग नहीं पाते हैं। इस बात को समझने के लिए हम मछलियों व रेशम के कीड़े के जीवन को देख सकते हैं। जाल में से निकलने की राह खुली है, फिर भी मछली भाग नहीं सकती।
रेशम का कीड़ा अपनी ही लार से कोश बनाकर उसमें फंसकर अपनी जान गंवा देता है। अक्सर मनुष्य इस अहंकार में जीता रहता है कि वह जो कुछ कर रहा है, वह सही है। कोई भी वस्तु को तराजू पर तौलते समय जब तक कांटा ठीक न हो, तब तक ठहरकर देखना पड़ता है। मैं समय-समय पर स्वयं को गालियां देकर देखता था कि मुझमें अहंकार उठता है या नहीं? मैं हमेशा विचार करता था कि हमारा हाड़-मांस का शरीर कैसा है? जिस शरीर को एक दिन मिट्टी में मिल जाना है, उस पर अहंकार कैसा? मान लिया जाए कि हांडी में चावल पक रहा है।

 

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