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श्रावक साबद्ध और निर्बद्ध दोनों वैयावृत्ति कर सकता है : मुनि विभंजन सागर जी –

 आज प्रवचनसार की व्याख्या करते हुए मुनिश्री ने बताया कि आचार्य भगवन कुन्द कुन्द स्वामी बता रहे है कि श्रावक साबद्ध और निर्बद्ध दोनों वैयावृत्ति कर सकता है। इस बात को समझना यदि साधु बीमार है तो उनके लिए लक्षादि तेल आदि की वैयावृत्ति करना चाहिए और उस तेल को गरम करके मालिश करना चाहिए ।लेकिन साधु तेल को उष्ण करने नहीं जायेंगे ये साबद्ध वैयावृत्ति है। साधु वैयावृत्ति करेंगे तो पहले पिच्छी से शरीर का मार्जन करेंगे फिर उसके बाद दबायेंगे ये निर्बद्ध वैयावृत्ति है। जिसमे षड्काय के जीव की विराधना न हो बो वैय्यावृत्ति आपस में साधु करेंगे।
मुनिश्री ने बताया संघ बहुत बड़ा है और कोई श्रावक नहीं है तो साधु का स्वाध्याय खराब हो गया तो साधु सेवा करेंगे की नहीं करेंगे? सल्लेखना कैसे करायेंगे? सेवा करेंगे लेकिन कोन सी ? साधु आहार बना नहीं सकता इसलिये जैन परम्परा में कही साधु कही कुछ मांगने नहीं जाते। दिगम्बर आमना में साधु के लिए शब्द आया ‘पाणी पात्र दिगम्बरा’ बर्तन भी नहीं रखते यदि रखेंगे तो परिग्रह हो जायेगा ,गंदे हो जाये तो मांजेगे तो आरम्भ हो जायेगा ।दिगम्बर मुनि आरम्भ ,सारम्भ परिग्रह सभी से रहित होते है बो कभी अपने पास बर्तन नहीं रखते इसलिये अपने हाँथो को ही बर्तन बना कर उसमेँ ही खड़े होकर एक टाइम आहार करते है ।न उन्हें किसी प्रकार की आशा है न उन्हें किसी प्रकार का अशक्ति पूर्वक परिग्रह जोड़ने की आवश्यकता है ।जैन श्रमण परम्परा में ‘पाणी पात्र दिगम्बरा’ अर्थात अपने हाँथो को ही पात्र बनाकर उसमें आहार ग्रहण करना है। दूसरी बात आप मुख में गिलाश लगा कर पानी पी लेते हो बो ही गकाश महा व्रती अपने मुख में लगाएंगे क्या? नहीं ।किसी के जूठे बर्तन में ग्रहण नहीं करना, ‘ पाणी पात्र दिगम्बरा’ इसलिये अपने हाँथो को ही ग्लाश बना लेते है और पानी पी लेते है।
मुनिश्री ने बताया यदि किसी की कोई जिज्ञासा हो शास्त्र सम्बन्धी तो उसको तुरन्त नहीं बनाना चाहिए। पहले उसके बारे में चिन्तन करे, जाने समझे उसके बाद उसका उत्तर देना चाहिए ।
मुनिश्री ने बताया एक बालक था और शिशु अवस्था में उसका परिवार दिवंगत हो गया। उस बालक के घर में बहुत बहुमूल्य रत्न भी थे लेकिन बो समाप्त हो चुके थे। साथ में कुछ कृतिम रत्न भी थे जब परिवार के लोग नहीं बचे तो उसके पिता जी के जो मित्र थे उनके यहाँ वो रत्न लेकर जाता है कि आप इनको रख लो अथवा इनकी बाजार में बिक्री करा दो जिससे मेरी आजीविका चले ,पर वह पिता का मित्र बहुत समझदार था वह उस बेटे से बोलता है- बेटे! तुम एक काम करो तुम मेरे यहाँ काम करो जब बाजार के भाव बड़ेगें तब हम आपके रत्नो की बिक्री करा देंगे ।धीरे- धीरे बालक रत्नों का अच्छा पारखी हो गया। और जब पिता के मित्र ने देख लिया की बेटा अच्छा पारखी हो गया। अब वह बालक से कहता है बेटे अपने रत्न लाओ बाजार के भाव अच्छे है तुम इनको बेच दो ।वह अपने घर रत्न लेने जाता है तो खाली हाँथ बापिस आता है जब मित्र ने पूछा – लाये नहीं? तो बेटा बोलता है आपको पहले बताना चाहिए था कि बो रत्न नहीं कांच के टुकड़े है ।आपने पहले क्यों नहीं बताया? मित्र बोलता है पुत्र मैं तेरे पिता का घनिष्ट मित्र हूँ ।यदि में पहले कह देता तो आप कभी नहीं मानते की मैं सत्य बोल रहा हूँ। अपितु यह कह देते की मेरे रत्न हड़पना चाहते है इसलिए इन्होंने काँच बोल दिया। अब देख लो क्या है काँच है या रत्न ।ऐसे ही बहुत सारे उत्तर पुरे नहीं देना चाहिए विद्वानों को, आचार्यो को, मुनिराजों को उनसे बोलो की पहले शास्त्र बढ़ो, और पढ़ोगे तो बहुत अच्छे से समझ में आएगा। जिनागम सागर के समान है ,समुद्र है समुद्र में हाँथ डालोगे तो कुछ न कुछ जरूर मिलेंगा। और जब कुछ मिलेगा तो उसके प्रति जानने की जिज्ञासा भी बढ़ेगी। जब हम शास्त्र का अध्ययन करते है तो कुछ जिज्ञासाएं बनती है और उनका समाधान करने के लिए पुनः शास्त्र का स्वाध्याय करना चाहिए ।
मुनिश्री ने बताया मात्र दिगम्बर साधु को देखकर उनके आचरण के विषय में कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए ।जैसा मूलाचार आदि ग्रन्थों में बताया गया है उन ग्रंथो का स्वाध्याय करके उसके बाद अब कोई से बात का निर्णय लेना चाहिए

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