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जो जीव जहाँ जाता है वहीं रम जाता है :मुनि विभंजन सागर –

श्रमण श्री विभंजनसागर जी मुनिराज ने प्रवचनसार ग्रन्थ की वाचना में बताया संसार ऐसा ही है। जिस जीव का जिस पर्याय में जन्म होता है वह जीव उस पर्याय में रम जाता है और उसमें ही आनंद मनाने लगता है। आचार्य पूज्य पाद स्वामी ने इष्टोपदेश ग्रन्थ में कहा है कि जो जीव जहाँ रमण कर लेता है दूसरी जगह जाता नहीं है यही समयसार का सार है बस इस बात को ही समझ लिया तो अंतरंग से वैराग्य उत्पन्न हो जायेगा अंतरंग से चारित्र धारण करने की क्षमता जाग्रत हो जायेगी ।
मुनिश्री ने बताया के आचार्य नेमिचंद्र मुनिराज ने द्रव्य संग्रह ग्रन्थ में चारित्र की परिभाषा बताते हुए कहा है कि अशुभ से निवर्त्ति ओर शुभ में प्रवृत्ति यही व्यवहार में से चारित्र है जो जिनेन्द्र भगवान ने कहाँ है। यही व्यवहार चरित्र है जब तक जीव उसमे लगा रहेगा उसमे ही अपनी प्रवृत्ति करता रहेगा तब तक वह व्रतों को धारण नहीं कर सकता , समिति का पालन नहीं कर सकता ,गुप्ती का पालन नहीं कर सकता ।चारित्र की परिभाषा कहि गई है 13 प्रकार का चरित्र कहा गया है तो सर्वप्रथम आचार्य भगवन कहते है  अशुभ कार्यो से  निवृत्ति करे, शुभ कार्यो में प्रवृत्ति करे तभी हमारे जीवन में चारित्र आ सकता है  ।
मुनिश्री ने बताया शुभ योग की प्रवृत्ति अशुभ योग का संवर कर देती है वहां शुभ का नहीं कर रही अशुभ का कर रही है। शुभ योग का संवर होगा वहाँ शुभ का भी संवर प्रारम्भ हो जायेगा लेकिन शुदोपयोग में भी अंतर है 13 वें गुण स्थान तक आस्रव चलता है ।शुभ सब संवर -संवर के काम है क्योंकि योग तो विराजत है जब यहाँ योग विराजता है तो व्रतियों से कहना ‘रत्नत्रय निर्वाणस्य हेतु  ‘रत्नत्रय रूप निर्वाण का ही हेतु है जो आप रत्नत्रय की आराधना कर रहे थे ।असंग्र रत्नत्रय के नियम से शुभ आस्रव होगा संवर के साथ । संवर को साथ रखिए आगम उसी निर्जरा को प्रयत्न करता है जो निर्जरा संवर के साथ है ।संवर शून्या निर्जरा को मोक्षमार्ग में स्वीकार नहीं करती।।
मुनिश्री ने बताया आश्चर्य है हाथ में दीपक तब भी जीव गड्ढे में जाये बड़ा आश्चर्य है।श्रुत जैसा दीपक तेरे सामने है फिर भी हमने सम्भाल नहीं पाया। इसमें श्रुत का क्या दोष ?आगम का क्या दोष? तत्व का श्रद्धात्मक दोष भिन्न है और तत्व का वेराग्यात्मक ज्ञान भिन्न है ।आज व्यक्ति जान भुझ कर संसार रूपी गड्ढे में प्रेवेश करने का प्रयाश करना बिना इच्छा की प्रवृत्ति संघी की नहीं होती ,बिना इच्छा के प्रवृत्ति असंघी की भी नहीं होती ।संघी की प्रवृत्ति मन से होती है ,असंघी की प्रवृत्ति संज्ञाओं से होती है ।ये निर्णय करना है कि शब्द ज्ञान रूपी रूचि क्यों नहीं गई? प्रति वहाँ होती है जहाँ रूचि होती है। इसलिए कहा गया है जो जीव जहाँ जाता है वही रम जाता है ।जो काम करता है वही काम करने लगता है ,जहाँ रहता है वही रम जाता है ।यदि आप ग्रहस्थ जीवन में है तो ग्रहस्थ में रम जाते है और यदि साधु जीवन में है तो साधु जीवन में रम जाते है ।और उस जीवन में रहकर वो अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है।
मुनिश्री ने बताया एक व्यक्ति मजदूरी करके अपने परिवार का पालन पोषण करता है अपने घर को चलाता है ,दिन भर महनत करता है तब जाकर उसे उतना ही फल मिलता है कि वो अपनी जीविका का पालन कर सके लेकिन एक इंजीनियर, डॉ., वकील जिन्होंने पड़ लिखकर एक अच्छी पोस्ट प्राप्त की वह अपना थोड़ा सा दिमाग का प्रयोग करते है और लाखों रु. कमा लेते है ।वहाँ वह मजदूर शारीरिक श्रम कर रहा है और यहाँ यह इंजीनियर, वकील, डॉ. मानसिक श्रम कर रहे है, मानसिक श्रम करने से फल अधिक मिलता है ।शारीरिक श्रम ग्रहस्थ जीवन में आगे बढ़ने के समान है और मानसिक श्रम मोक्षमार्ग में आगे बढ़ने के समान है। व्यक्ति जब सांसारिक कार्य करता है तो कर्मो का बन्ध बाँधता है और जब मन के माध्यम से मानसिक श्रम करके ध्यान करता है तो कर्मो की निर्जरा करके मोक्ष प्राप्त करता है। इसलिए मोक्ष मार्ग में आओ और उसमे रम जाओ ।मोक्ष की प्राप्ति जरूर होगी।
मुनि संघ का कल सुबह 7 बजे  श्री दिगम्बर जैन, अटा मन्दिर ललितपुर उत्तर प्रदेश के लिए मंगल विहार होगा ।जहाँ पर पूज्य आचार्य श्री पारस सागर जी मुनिराज से मंगल मिलन होगा।

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