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दर्पण जैसा जीवन बनाकर जीये: मनीषी संत मुनिश्री विनय कुमार जी –

दर्पण जैसा जीवन जीना सीखे उन सभी खिड़कियों को बंद कर दे जिनमे आने वाली गन्दी हवा इंसान को इंसान नहीं रहने देती |मनुष्य की तलाश यह स्वर अक्सर सुनने को मिलता है कि आज आदमी आदमी नहीं रहा दार्शनिक खलील जिब्रान का कथन है कि ईश्वर का ही पहला शब्द था मनुष्य ईश्वर के प्रारंभिक दोनों ही चिंतन आज लुप्तप्राय है इन्ही स्थितयों के बीच दार्शनिक डॉ. राधाकृष्णन की इन पक्तियो का स्मरण हो आया ‘हमने पक्षियों की तरह उड़ना और मछलियों की तरह तैरना तो सीख लिया है किन्तु मनुष्य की तरह पृथ्वी पर चलना और जीना नहीं सीखा है ये शब्द मनीषी संत मुनिश्री विनय कुमार जी आलोक ने सेक्टर 24 सी अणुव्रत भवन में सभा को सम्बोदित करते हुए कहा मनीषी श्री संत ने आगे ये कहा कि जब कोई आदमी ठीक काम करता है तो उसे पता तक नहीं चलता कि वह क्या कर रहा है पर गलत काम करते समय उसे हर क्षण यह मलाल रहता है कि वह जो कर रहा है वह गलत है गलत को गलत मानते हुए भी इंसान गलत कार्य किये जा रहा है इसी कारण समस्याओ और अधेरो के अम्बार लगे हुए है कुछ लोग अच्छे भी है शायद उनकी अच्छाइओ के कारण ही जीवन बचा हुआ है

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