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दान के द्रव को अपनी द्रव में कभी नहीं मिलाना – मुनि विभंजनसागर जी –

आज मुनिश्री ने प्रवचनसार ग्रन्थ की वाचना करते हुए बताया कि आपका तीव्र पुण्य कर्म का उदय है जो भगवान की वाणी रसपान करने का अवसर आपको मिल रहा है। इस खोटे काल में पंचमकाल में भी जिनवाणी का रसपान आप कर रहे हैं, ये आपका पुण्य का उदय ही है ।एक बात याद रखना जनवानी से कभी कल्याण नहीं होता जिनवाणी से कल्याण होता है। जिनवाणी का तातपर्य है जिनेन्द्र भगवान की देशना, जिनेन्द्र भगवान की वाणी जो जग का कल्याण करने वाली है।
मुनिश्री ने बताया मात्र एक बार जिनवाणी को सच्चे हृदय से सुन लेते तो जीवन का अर्थ समझ में आ जाता। जिसने जिनवाणी का रसपान किया है वह सम्यक्त्व को प्राप्त करेगा। क्योकि किसी भी काल में बिना देशना लब्धी के विशुद्धि लब्धी नहीं होती और बिना विशुद्धि लब्धी के करण लब्धी नहीं होती और बिना करण लब्धी के सम्यकदर्शन नहीं होता।
मुनिश्री ने कहा जो आज तुम जिनवाणी सुन रहे हो कदाचित अशुभ आयु का भी बन्ध हो गया हो तो आज का सुना तत्व नरक में भी नारकी को सम्यक का साधन बनता है। हजारो काम छोड़ देना और यथार्थ में जिनवाणी चल रही हो तो उसे मत छोड़ना यथार्थ शब्द पर ध्यान रखना ,यथार्थ में जिनवाणी चल रही हो तो उसे मत छोड़ना ।किसी के निन्दा पुराण नहीं सुनना निन्दा पुराण चल रहे हो जनवाणी चल रही हो तो कानो में ऊँगली डाल लेना कही मेरी विशुद्धि भंग न हो जाये निन्दा पुराण सुनकर ,जनवाणी को सुनकर। जनवाणी से कल्याण नहीं होगा जिनवाणी से कल्याण होगा ।
मुनिश्री ने कहा छःटे काल के दर्शन करने की इच्छा किसकी है ?वैसा काल जिस काल में एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को कच्चा खायेगा ,ऐसे काल में नहीं जाना है तो भैया अपने जीवन को सरल बनाना मान कषाय को छोड़ना ,क्रोध को छोड़ना मायाचारी को छोड़ना, लोभ करना छोड़ देना पांच पापो से विरक्त हो जाना ,सप्त व्यशन का त्याग कर देना ।सरल रहो, सरल जिओ यदि छःटे काल में नहीं जाना है तो और ज्यादा कुछ तुमसे न बने ,कुछ भी न बने तो साधुओं के कमण्डलु भी श्रद्धा से पकड़ता रहेगा ,पंच परमेष्ठि की वंदना करता रहेगा तो छःटे काल से बच जायेगा। अभक्ष्य आदि का सेवन नहीं करना तो छःटे काल से बच जायेगा।
मुनिश्री ने कहा जिसका सम्यक पल गया वो छःटे काल में नहीं जा सकता ।चारित्र न भी हो तुम्हारे पास यदि सम्यक भी पल गया तो छःटे काल में जाने से बच जाओगे ,नियम से बच जाओगे। जिनवाणी को श्रद्धा पूर्वक वही सुन पाता है जो छःटे काल में नहीं जाता स्वर्ग चले जाना सम्यक का पालन करके पर देवांगनाओं में मत रच पच जाना नन्दीश्वर द्वीप जाना, सुमेरु पर्वत पर जाना ,कृतिम अकृतिम जिन मंदिरों की वंदना करना स्वर्ग में वंदना करके इतना पुण्य संग्रहित कर लेना की वहा से मनुष्य बनके चाहे भरत के तीर्थंकरों के पाद मूल में चाहे विदेह या ऐरावत तीर्थंकरों के पाद मूल में बैठ करके चारित्र की आराधना करके निर्वाण को प्राप्त कर लेना।
मुनिश्री ने बताया हम महावीर स्वामी को नमस्कार करेंगे ,क्यों? क्योकि हम उनके शासन में है हम उनको नमस्कार करेंगे जिनसे मैने दीक्षा ली है ,क्यों? क्योकि इनसे मेरी स्वार्थ की शिद्धि होती है ।भैया स्वार्थ के लिए नमस्कार नहीं किया जाता। आज वर्तमान में यही देखा जाता है कि जो मंत्र तंत्र करता है ,श्री फल आदि की फूंक कर देता है, कोई चमत्कार दिखता है उनको व्यक्ति नमस्कार करता है। जहाँ पर लाखों की भीड़ जुडी हुई है ,करोड़ो का दान इक्कठा होता है वहाँ व्यक्ति नमस्कार करता है ।अरे जैनागम में भीड़ को नमस्कार नहीं किया जाता जैनागम में चारित्र को गुणों को नमस्कार किया जाता है ।इसलिए जहाँ-जहाँ जिनवाणी सुनने मिले वहाँ बिना सोचे विचारे चले जाना और बैठ जाना ,जिनवाणी का रसपान करने क्योकि वह जिनवाणी ही हमारी आत्मा को परमात्मा बनाने का एक साधन है ।अगर हम भी अपना कल्याण करना चाहते है तो भगवान की वाणी पर श्रद्धान करे ,ज्ञान करे और जीवन में उतारने का प्रयाश करे ।
मुनि संघ का आज दोपहर 2 बजे श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र बानपुर ,जिला टीकमगढ़, (म. प्र.) के लिए मंगल विहार होगा ।

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