ब्रेकिंग न्यूज़
Home » Uncategorized » पूर्व की पुण्य की सत्ता के साथ -साथ वर्तमान की पवित्रता भी जरूरी है देखिये श्री विभंजनसागर जी मुनिराज के मंगल प्रवचन
पूर्व की पुण्य की सत्ता के साथ -साथ वर्तमान की पवित्रता भी जरूरी है देखिये श्री विभंजनसागर जी मुनिराज के मंगल  प्रवचन

पूर्व की पुण्य की सत्ता के साथ -साथ वर्तमान की पवित्रता भी जरूरी है देखिये श्री विभंजनसागर जी मुनिराज के मंगल प्रवचन

मध्य प्रदेश – श्री दिगम्बर जैन मन्दिर समर्रा, जिला टीकमगड़,(म. प्र.) में श्रमण श्री विभंजनसागर जी मुनिराज एवं श्रमण श्री विश्वक्षसागर जी मुनिराज का मंगल आगमन हुआ। मुनिश्री ने प्रवचनसार ग्रन्थ की व्याख्या करते हुए बताया कि वर्तमान में जिनके पास पैसा है ,सुख है, समृद्धि है वो पूर्व की पुण्य की सत्ता के साथ वर्तमान के जीवन जीने की पवित्रता से ही होता है। पूर्व के पुण्य के साथ वर्तमान की पवित्रता नहीं है तो कुछ ही दिनों में खाक के हो जाओगे। पूर्व पुण्य की पवित्रता के साथ – साथ वर्तमान के जीने की परंपरा भी कार्यकारी है ।एक रिक्से वाला हजार ,500 कमाता है यदि वह सुरक्षित रखे तो चंद दिनों के अन्दर महल में बैठ सकता है परन्तु इतने कमाके आता है और साम को देखना कहाँ- कहाँ जाता है और सभी खर्च कर देता है ।और एक श्रावक 100 रूपये भी कमायेगा तो घर में शुद्ध भोजन करेगा ,वह 50 रूपये भी खर्च करेगा तो 50 रूपये सुरक्षित रख लेता है। ऐसे -ऐसे श्रावक है जो परिग्रह का परिमाण किये है और सुख से जीवन जी रहे है ।
मुनिश्री ने बताया हमारा जीवन तभी शुद्ध हो सकता है जब हमारा खान, पीन शुद्ध होगा। एक भोजन मात्र से ,एक आहार मात्र से हमारे विचार पवित्र हो जाते है, हमारा आचरण पवित्र हो जाता है । जैसा भोजन करते है वैसे ही मन में विचार आने लगते है ।बड़े पुजुर्गो ने कहाँ है जैसा-” खाओ अन्न वैसा होगा मन ,जैसा पीओगे पानी वैसी होगी वाणी” ।यदि अपने आचार विचार हो शुद्ध रखना है तो सबसे पहले अपने आहार को शुद्ध रखे भोजन करे तो सोचे ,समझे, देखे, विचारे आप क्या खा रहे है? कैसा खा रहे है? कहाँ से आया है? किसने बनाया है? उसमें क्या -क्या डाला गया है? शुद्ध है या अशुद्ध है? भक्ष है या अभक्ष्य है? आपके खाने योग्य है कि नहीं है ? सब बातों का विचार करके ही भोजन करना चाहिए।
मुनिश्री ने बताया जहाँ आपका भोजन बनता है उस रसोई घर में एक मुनिराज की फोटो लगानी चाहिए ।साधु का चित्र रहेगा तो तुम अभक्ष्य तो नहीं लाओगे उसके अन्दर। मुख्य बस्तु को समझना, मुनि को भोजन दे फिर निज करही आहारे पं. दौलतराम जी ने छः ढाला में लिखा है – मुनि को भोजन करके फिर आपको भोजन करना चाहिए। रसोई घर में जब साधु का चित्र होगा और जैसे ही तुम थाली लगा के पहुँचोगे तो ईर्या समिति का ध्यान रखोगे। कुछ लोगो की आदत ठीक नहीं होती है । ऐसे बहुत कम है जो मुख में गिरास रख कर के नीचे दृष्टि रखे। आपने ऊठ को खाते देखा कभी ,ऊठ कितना ही मुख भर ले चबाता है तो और ऊँपर कर लेता है। ऐसे बहुत सारे लोग होते है कि मुख में गिरास रखा और चारो तरफ देखना सुरु किया ।अरे भैया ऊठ बनकर मत जीना, दृष्टि को नीची करके आहार करना ,इधर उधर मत झांकना ।
मुनिश्री ने बताया जिस समय आप भोजन कर रहे हो और उसी समय आपका ध्यान ऊपर चला गया मुनि के चित्र को देखकर विचारता है कि मेरा वो कुल है जिस कुल में मैने मुनि को आहार देकर भोजन किया जाता था तो कम से कम भोजन कारने के पहले आपको मुनि की याद तो आ जायेगी ।महाराष्ट्र में तो कई जगह मेने देखा – वहाँ छोटे -छोटे घर है ,घर – घर में मन्दिर है, गरीब है, घर छोटे है वह भी रसोई में अपने भगवान को रखे है। क्योंकि रसोई घर से पवित्र और कोई स्थान नहीं होता ।कोई यहाँ सोता नहीं है ,यहाँ कोई गलत काम नहीं होते ,यहाँ भोजन बनता है तब खिड़की बंद रखते है और जब भोजन करते है तो भगवान की याद आती है तो गलत सामग्री लाने का मन नहीं करता ।इसका मतलब अच्छे भाव रखना ।इसका मतलब यह मत समझ लेना की मैं भगवान को लेकर बैठ जाऊ। बड़ा घर है तो अच्छे स्थान पर विराजमान करना।
मुनिश्री ने बताया जिस चटाई पर विश्राम करते हो उस चटाई पर सामायिक नहीं करना चाहिए, स्वाध्याय भी नहीं करना ,विश्राम कर रहे हो मोख से लार गिर गई वह चटाई अशुद्ध हो गई इसलिये स्वाध्याय और सामायिक की चटाई अलग होना चाहिए। इस प्रकार से सम्पूर्ण सिद्ध को ,सम्पूर्ण श्रमणों को श्रमण शब्द से वाच्य आचार्य ,उपाध्याय ,साधुओं को कहना चाहिए और उनकी वंदना करना चाहिए और भोजन के पूर्व पाँचो परमेष्ठियों का स्मरण करते हुए भोजन प्रारम्भ करना चाहिए और भोजन करने के पश्चात पुनः एक बार पाँचो परमेष्ठियों का स्मरण करते हुए 9 बार णमोकार मंत्र पढ़कर भोजन समाप्त करना चाहिए ।यही आपका विवेक है, यही आपकी संस्कृति है जैसे हमारे भाव होंगे वैसे ही हमारे लिए भोजन कार्य कारी होगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Share